आज़ादी की आड़ में ज़हर कौन फैला रहा है?

सोशल मीडिया और नफ़रत का बाज़ार सोशल मीडिया को एक समय लोकतंत्र का सबसे मज़बूत औज़ार माना गया था। यह वह मंच था जहाँ बिना किसी बड़े मीडिया संस्थान या सत्ता के संरक्षण के, आम आदमी अपनी बात दुनिया तक पहुँचा सकता था। लेकिन समय के साथ यह मंच संवाद का नहीं, बल्कि टकराव का अड्डा बनता जा रहा है। आज सोशल मीडिया पर बहस कम और नफ़रत ज़्यादा बिक रही है।
यह सवाल अब सिर्फ़ नैतिक नहीं रहा, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक बन चुका है क्या सोशल मीडिया लोगों को जोड़ रहा है या योजनाबद्ध तरीके से बाँट रहा है? एल्गोरिदम तय कर रहा है सच आज सोशल मीडिया पर वही कंटेंट तेज़ी से फैलता है जो लोगों को उकसाए, डराए या गुस्सा दिलाए। एल्गोरिदम को न तो सच से मतलब है और न ही सामाजिक ज़िम्मेदारी से। उसे चाहिए सिर्फ़ engagement—लाइक, शेयर, कमेंट। नतीजा यह है कि नफ़रत भरी पोस्ट मिनटों में वायरल होती है झूठी ख़बरें सच से पहले पहुँच जाती हैं और संयमित, तथ्यपरक आवाज़ें शोर में दब जाती हैं यह एक ऐसा तंत्र बन चुका है जहाँ उत्तेजना मुनाफ़े का ज़रिया बन गई है। अभिव्यक्ति की आज़ादी या अराजकता? अभिव्यक्ति की आज़ादी लोकतंत्र की बुनियाद है, लेकिन सवाल यह है कि उसकी सीमा कहाँ खत्म होती है? जब कोई पोस्ट किसी समुदाय को निशाना बनाती है, हिंसा को जायज़ ठहराती है या नफ़रत को सामान्य बना देती है, तब क्या वह आज़ादी कही जा सकती है? आज सोशल मीडिया पर धर्म, जाति, भाषा और विचारधारा के नाम पर लोगों को खुलेआम गालियाँ दी जाती हैं, धमकियाँ मिलती हैं और कई बार इसका अंजाम सड़कों पर हिंसा के रूप में सामने आता है। फिर भी इसे “ऑनलाइन मामला” कहकर हल्के में लिया जाता है। नफ़रत अब संगठित है यह मान लेना भूल होगी कि यह सब स्वतः हो रहा है। कई मामलों में नफ़रत फैलाने का काम संगठित और योजनाबद्ध तरीके से होता है— फ़र्ज़ी अकाउंट्स का नेटवर्क ट्रेंड को मैनेज करने वाली टीम पुराने वीडियो को नए संदर्भ में पेश करना आधी जानकारी को पूरे सच की तरह दिखाना इसका मकसद साफ़ है—समाज को बाँटना, सवालों से ध्यान हटाना और डर का माहौल बनाना। राजनीति और सोशल मीडिया सोशल मीडिया अब सिर्फ़ सामाजिक मंच नहीं रहा, यह एक राजनीतिक हथियार बन चुका है। चुनाव हों या नीतिगत फैसले, हर जगह सोशल मीडिया से माहौल बनाया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि जब यही मंच सत्ता के पक्ष में काम करता है, तब उसे “जनता की आवाज़” कहा जाता है। लेकिन जब सवाल पूछे जाते हैं, तब नियंत्रण और क़ानून की बात शुरू हो जाती है। सरकारें और सोशल मीडिया कंपनियाँ दोनों ही अक्सर अपनी ज़िम्मेदारी से बचती नज़र आती हैं। प्लेटफॉर्म की चुप्पी सोशल मीडिया कंपनियाँ दावा करती हैं कि वे सिर्फ़ टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म हैं, कंटेंट के लिए ज़िम्मेदार नहीं। लेकिन जब नफ़रत से ट्रैफिक बढ़ता है, विज्ञापन बढ़ते हैं और मुनाफ़ा होता है, तब यह तर्क खोखला लगता है। सवाल साफ़ है— अगर नफ़रत से कमाई हो रही हो, तो क्या उसे रोकने की ईमानदार इच्छा होगी? आम आदमी इसकी कीमत चुका रहा है इस पूरे खेल का सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिक को हो रहा है। समाज में अविश्वास बढ़ रहा है रिश्तों में कड़वाहट आ रही है हिंसा को वैचारिक समर्थन मिलने लगा है धीरे-धीरे हम नागरिक नहीं, बल्कि गुस्साई भीड़ में बदलते जा रहे हैं, जिसे हर दिन किसी नए दुश्मन की ज़रूरत होती है। समाधान क्या है? इस समस्या का कोई एक आसान हल नहीं है, लेकिन कुछ कदम ज़रूरी हैं डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा नफ़रत और आलोचना के बीच फर्क की समझ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही और सरकार की निष्पक्ष भूमिका लेकिन सबसे अहम है नागरिकों की जागरूकता। जब तक लोग खुद सवाल नहीं करेंगे, तब तक नफ़रत बिकती रहेगी। अंतिम सवाल अगर सोशल मीडिया सच में समाज का आईना है, तो यह आईना इतना विकृत क्यों हो गया है? क्या हम नफ़रत देखना चाहते हैं, या हमें वही दिखाया जा रहा है? सवाल पूछना ज़रूरी है, क्योंकि चुप्पी सिर्फ़ सहमति नहीं—कभी-कभी अपराध भी होती है।
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