Delhi Police: जंतर-मंतर पर तिरंगे से इतना डर क्यों, दिल्ली पुलिस? असहमति से निपटने का यही है नया तरीका!

 


नई दिल्ली,

देश की राजधानी में लोकतंत्र का एक अजीब तमाशा चल रहा है। जिस तिरंगे के सम्मान की कसमें खाई जाती हैं, उसी तिरंगे को जंतर-मंतर पर फहराने के मामले में कार्रवाई और गिरफ्तारी की खबरें सामने आ रही हैं। कॉकरोच जनता पार्टी के आशुतोष रांका और सौरव दास को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के बाद दिल्ली पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं। सवाल सीधा है क्या अब दिल्ली में विरोध जताने के लिए भी पुलिस की सुविधा और सत्ता की सहमति जरूरी हो गई है?

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली की विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट अदालत ने दोनों को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दिया। दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर में प्रवेश करने की कोशिश के मामले में उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी। यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ, जब जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन स्थल के रूप में रद्द किए जाने की खबर सामने आई थी।

अब जरा दिल्ली पुलिस की प्राथमिकताओं पर गौर कीजिए। राजधानी में विरोध करने वालों के लिए जगह सीमित हो जाए, तो क्या लोकतंत्र की आवाज भी सीमित हो जानी चाहिए? अगर कोई राजनीतिक दल अपनी बात रखने के लिए किसी सार्वजनिक स्थल तक पहुंचने की कोशिश करता है, तो उसका जवाब केवल पुलिसिया कार्रवाई ही क्यों दिखाई देता है? कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है, लेकिन लोकतंत्र में असहमति को जगह देना भी उतना ही जरूरी है।

सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने एक्स पर लिखा कि आशुतोष रांका और सौरव दास को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। उन्होंने सवाल उठाया कि उनका कसूर क्या था जंतर-मंतर पर तिरंगा फहराना? दीपके ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि यदि सरकार असहमति की आवाजों को कुचलने के लिए इतनी दृढ़ है, तो उसे आपातकाल घोषित करने का साहस दिखाना चाहिए।

दिल्ली पुलिस से सवाल पूछना जरूरी है। आखिर विरोध-प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थान को लेकर विवाद होने पर संवाद और स्पष्टता का रास्ता क्यों नहीं अपनाया जा सकता? क्या हर असुविधाजनक आवाज को कानून-व्यवस्था की समस्या मान लेना सबसे आसान प्रशासनिक रास्ता बन गया है?

बेशक, किसी भी सार्वजनिक स्थल पर प्रवेश और प्रदर्शन के नियम हो सकते हैं। पुलिस को कानून लागू करने का अधिकार भी है। लेकिन अधिकार का इस्तेमाल किस तरह किया जाता है, यही लोकतांत्रिक व्यवस्था की असली परीक्षा है। किसी कार्रवाई की वैधता का फैसला तथ्यों, लागू नियमों और अदालत के आदेश से होगा; केवल आरोपों या राजनीतिक नारों से नहीं।

फिर भी दिल्ली पुलिस को यह समझना होगा कि तिरंगा किसी एक सरकार, पार्टी या प्रशासन की निजी संपत्ति नहीं है। वह देश के नागरिकों का गौरव और लोकतांत्रिक अधिकारों की याद दिलाने वाला राष्ट्रीय ध्वज है। इसलिए तिरंगे से जुड़े किसी विवाद में पारदर्शिता और संयम बेहद जरूरी हैं।

लोकतंत्र में पुलिस की ताकत इस बात से नहीं मापी जाती कि उसने कितने लोगों को हिरासत में लिया, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि उसने नागरिकों के अधिकारों की रक्षा कितनी निष्पक्षता से की। जंतर-मंतर पर उठे इस विवाद का जवाब केवल हिरासत से नहीं, बल्कि स्पष्ट नियमों, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक मर्यादा से मिलना चाहिए। दिल्ली पुलिस को याद रखना चाहिए आवाज दबाने से सवाल खत्म नहीं होते, कई बार वे और तेज हो जाते हैं।

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