नई दिल्ली,
अंकिता भंडारी हत्याकांड एक बार फिर देश की राजनीति के केंद्र में है। उत्तराखंड के एक रिसॉर्ट में काम करने वाली 19 वर्षीय युवती की हत्या के मामले में तीन लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई जा चुकी है। इसके बावजूद एक सवाल आज भी लोगों के मन में बना हुआ है क्या इस मामले में न्याय की प्रक्रिया पूरी हो गई है, या फिर कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब अभी सामने आने बाकी हैं? अंकिता के माता-पिता का संघर्ष इसी सवाल को देश के सामने रख रहा है। कथित वीआईपी की भूमिका की जांच और भाजपा नेता दुष्यंत कुमार गौतम को सिक्किम का राज्यपाल बनाए जाने के बाद यह विवाद फिर गहरा गया है।
अंकिता की हत्या सितंबर 2022 में हुई थी। वह ऋषिकेश के निकट वनंतरा रिसॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट के रूप में काम करती थीं। इस मामले में रिसॉर्ट के मालिक पुलकित आर्य और उसके दो सहयोगियों सौरभ भास्कर तथा अंकित गुप्ता को मई 2025 में अदालत ने दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। यह न्यायिक कार्रवाई महत्वपूर्ण है, लेकिन परिवार की चिंता का केंद्र केवल उन तीन दोषियों की सजा नहीं है। परिवार लगातार उस कथित वीआईपी की पहचान और भूमिका को लेकर सवाल उठा रहा है, जिसके लिए अंकिता पर विशेष सेवाएं देने का दबाव बनाए जाने की बात सामने आई थी।
आखिर कथित वीआईपी का सवाल अब तक क्यों बना हुआ है?
किसी भी हत्या के मामले में दोषियों को सजा मिलना न्याय का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन यदि पीड़ित परिवार किसी संभावित अतिरिक्त भूमिका की जांच की मांग कर रहा हो, तो उस मांग का जवाब केवल पहले से हुई कार्रवाई का उल्लेख करके नहीं दिया जा सकता। परिवार को यह भरोसा भी मिलना चाहिए कि उसके प्रत्येक गंभीर सवाल की जांच निष्पक्षता से की जा रही है।
अंकिता के मामले में कथित वीआईपी की पहचान को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। इस संबंध में अलग-अलग दावे किए गए हैं, लेकिन किसी व्यक्ति पर आरोप लगना और अदालत में उसका दोष सिद्ध होना दो अलग-अलग बातें हैं। इसलिए किसी भी नाम को बिना पर्याप्त प्रमाण के अपराधी घोषित करना उचित नहीं है। साथ ही, किसी प्रभावशाली व्यक्ति का नाम विवाद में आने मात्र से जांच के सवाल समाप्त नहीं हो जाते। असली कसौटी यह है कि जांच एजेंसी उपलब्ध साक्ष्यों की पड़ताल कितनी स्वतंत्रता और पारदर्शिता से करती है।
राज्यपाल की नियुक्ति ने क्यों बढ़ाया विवाद?
दुष्यंत कुमार गौतम को सिक्किम का राज्यपाल नियुक्त किए जाने के बाद अंकिता के माता-पिता ने दिल्ली के इंडिया गेट पर विरोध-प्रदर्शन किया। उनकी मांग है कि कथित वीआईपी एंगल की सीबीआई जांच पूरी होने तक नियुक्ति पर रोक लगाई जाए। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी परिवार से मुलाकात कर उसका समर्थन किया। राहुल गांधी ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से नियुक्ति पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया।
यहां सबसे बड़ा सवाल सरकार की प्राथमिकताओं और सार्वजनिक जवाबदेही का है। जब किसी संवेदनशील आपराधिक मामले में पीड़ित परिवार लगातार अधूरी जांच की शिकायत कर रहा हो, तब सरकार और संवैधानिक संस्थाओं से अपेक्षा की जाती है कि वे उसके सवालों का स्पष्ट जवाब दें। राज्यपाल जैसा संवैधानिक पद केवल राजनीतिक नियुक्ति का विषय नहीं है; उससे सार्वजनिक विश्वास और संस्थागत निष्पक्षता की अपेक्षाएं भी जुड़ी होती हैं।
दुष्यंत कुमार गौतम के खिलाफ लगाए गए आरोपों को न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता। लेकिन इस आधार पर परिवार की मांग को अनसुना कर देना भी उचित नहीं होगा। सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि कथित वीआईपी एंगल की जांच की वर्तमान स्थिति क्या है, किन सवालों की पड़ताल की जा रही है और जांच के निष्कर्ष तक पहुंचने में क्या बाधाएं हैं।
पीड़ित परिवार को हिरासत में लेने से सवाल खत्म नहीं होते
दिल्ली में विरोध कर रहे अंकिता के माता-पिता को पुलिस ने हिरासत में लिया और बाद में छोड़ दिया। यह घटना अपने आप में गंभीर सवाल खड़े करती है। अपनी बेटी के लिए न्याय मांग रहा परिवार यदि सार्वजनिक स्थान पर प्रदर्शन करता है, तो प्रशासन की पहली जिम्मेदारी उसकी बात सुनना और कानून के दायरे में शांतिपूर्ण विरोध की अनुमति सुनिश्चित करना होनी चाहिए। कानून-व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार पुलिस के पास है, लेकिन उस अधिकार का इस्तेमाल किस परिस्थिति में और किस तरीके से किया गया, इसका जवाब भी जरूरी है।
किसी प्रदर्शन को नियंत्रित कर देना आसान हो सकता है, लेकिन उससे परिवार के मन में मौजूद संदेह समाप्त नहीं होते। उलटे, यदि कार्रवाई से यह संदेश जाता है कि सवाल पूछने वालों को सुनने के बजाय हटाया जा रहा है, तो संस्थाओं के प्रति अविश्वास बढ़ सकता है। लोकतंत्र में पीड़ित परिवार की आवाज को राजनीतिक शोर मानकर खारिज नहीं किया जाना चाहिए।
सरकार को जवाब देना होगा
उत्तराखंड सरकार की ओर से गिरफ्तारी, एसआईटी की जांच, आरोपपत्र और अदालत से मिली सजा का उल्लेख किया गया है। परिवार को आर्थिक सहायता देने तथा उसकी कुछ मांगें स्वीकार करने की बात भी सामने आई है। लेकिन इन कदमों का महत्व अपनी जगह है; इनसे कथित वीआईपी की भूमिका को लेकर उठे सवालों का जवाब अपने आप नहीं मिल जाता।
अब जरूरत स्पष्ट और समयबद्ध कार्रवाई की है। सीबीआई जांच की स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए, परिवार को जांच की प्रगति के बारे में जानकारी मिलनी चाहिए और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निष्कर्ष तक पहुंचना चाहिए। यदि किसी प्रभावशाली व्यक्ति के खिलाफ आरोपों को पुष्ट करने वाला प्रमाण मिलता है, तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते, तो जांच के आधार पर यह बात भी स्पष्ट की जानी चाहिए।
अंकिता भंडारी अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके माता-पिता की न्याय की लड़ाई जारी है। किसी भी सरकार की जवाबदेही केवल यह बताने तक सीमित नहीं हो सकती कि उसने अब तक क्या किया। उसे यह भी बताना होगा कि बचे हुए सवालों का जवाब कब और कैसे मिलेगा। कथित वीआईपी की पहचान और भूमिका पर स्पष्टता, निष्पक्ष जांच तथा परिवार के प्रति संवेदनशील व्यवहार ही इस मामले में सार्वजनिक विश्वास बहाल करने का रास्ता है।
