निर्वाचन आयोग के खिलाफ आवाज उठाना सरकार के खिलाफ बगावत नहीं, लोकतंत्र का अधिकार है। फिर दिल्ली में प्रदर्शनकारियों को रोकने, हिरासत में लेने और महिलाओं पर हमले के बीच पुलिस की भूमिका पर सवाल क्यों न उठें? क्या भाजपा सरकार में लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव के दिन वोट देना रह गया है?
नई दिल्ली,
दिल्ली में निर्वाचन आयोग के खिलाफ प्रदर्शन करना क्या भाजपा सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ना है? अगर नहीं, तो फिर राजधानी को प्रदर्शनकारियों के लिए जंग का मैदान क्यों बना दिया गया है? अपनी बात रखने सड़क पर उतरने वाले नागरिकों को हिरासत में लेकर आखिर किस कानून-व्यवस्था की रक्षा की जा रही है? क्या लोकतंत्र में सरकार, निर्वाचन आयोग और चुनावी प्रक्रिया से सवाल पूछने का अधिकार किसी के पास है या नहीं?
इन सवालों का जवाब
भाजपा सरकार और दिल्ली पुलिस को देना चाहिए। लोकतंत्र में जनता सरकार चुनती है, सरकार जनता की मालिक नहीं बन जाती। सत्ता
में बैठने का अर्थ यह नहीं कि सरकार की नीतियों, निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली या चुनावी प्रक्रिया पर उठने
वाले सवालों को दबा दिया जाए। यदि किसी नागरिक को चुनावी व्यवस्था पर संदेह है, यदि कोई संगठन निर्वाचन आयोग के फैसलों
का विरोध करना चाहता है, तो उसका जवाब पुलिस की बैरिकेडिंग, हिरासत और दबाव से नहीं, बल्कि तथ्यों, पारदर्शिता और जवाबदेही से दिया जाना
चाहिए।
निर्वाचन आयोग पर सवाल उठाना अपराध नहीं
निर्वाचन आयोग देश
की लोकतांत्रिक व्यवस्था की महत्वपूर्ण संस्था है। उसकी निष्पक्षता, निर्णयों और कार्यप्रणाली पर सवाल उठना
स्वाभाविक है। किसी भी लोकतांत्रिक संस्था को आलोचना से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
निर्वाचन आयोग के खिलाफ आवाज उठाने का अर्थ देश के खिलाफ आवाज उठाना नहीं है।
चुनावी प्रक्रिया की आलोचना करना संविधान का अपमान नहीं है। बल्कि चुनाव को
पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने के लिए सवाल पूछना जरूरी है।
लेकिन दिल्ली में
विरोध करने वालों के साथ जिस तरह की सख्ती की शिकायतें सामने आती हैं, उससे एक गंभीर सवाल पैदा होता है क्या भाजपा सरकार आलोचना को लोकतंत्र का हिस्सा मानती है या उसे अपनी सत्ता के
लिए खतरा समझती है? जब नागरिक सवाल पूछते हैं, तो सरकार को जवाब देना चाहिए। जब विपक्ष
विरोध करता है, तो उसके तर्कों का सामना किया जाना
चाहिए। लेकिन यदि हर विरोध को कानून-व्यवस्था की समस्या बताकर दबाने की कोशिश की
जाए, तो लोकतंत्र का वास्तविक उद्देश्य ही
कमजोर पड़ता है।
भाजपा सरकार को यह
समझना होगा कि निर्वाचन आयोग कोई राजनीतिक दल नहीं है और उसका विरोध करना अपने आप
में सरकार के खिलाफ हिंसक कार्रवाई नहीं है। लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल
करने वाले नागरिकों को अपराधी की तरह पेश करना किसी भी सरकार के लिए शर्मनाक
स्थिति है।
दिल्ली पुलिस की प्राथमिकता आखिर क्या है?
दिल्ली पुलिस की
जिम्मेदारी नागरिकों की सुरक्षा करना, कानून का पालन सुनिश्चित करना और हिंसा को रोकना है। पुलिस
किसी राजनीतिक दल की निजी सुरक्षा व्यवस्था नहीं है। उसकी जवाबदेही संविधान, कानून और जनता के प्रति है। लेकिन जब
प्रदर्शनकारियों को रोकने और हिरासत में लेने में पुलिस पूरी ताकत लगा देती है, जबकि उसी दौरान महिलाओं पर हमले या उनके
साथ दुर्व्यवहार की शिकायतें सामने आती हैं, तो पुलिस की प्राथमिकताओं पर सवाल उठना बिल्कुल स्वाभाविक
है।
यदि किसी महिला के
साथ पुलिस की मौजूदगी में मारपीट होती है, तो सबसे पहला सवाल यही होगा कि पुलिस ने उसे बचाने के लिए
क्या किया? हमला करने वालों को रोकने की कोशिश हुई
या नहीं? पीड़ित महिलाओं की शिकायत पर तत्काल
कार्रवाई की गई या नहीं? आरोपित लोगों की पहचान कर उनके खिलाफ
कानूनी कदम उठाए गए या नहीं? इन सवालों का जवाब
देना पुलिस की जिम्मेदारी है।
कानून का राज तभी
माना जाएगा, जब कानून सबके लिए समान हो। प्रदर्शन
करने वाला व्यक्ति कानून तोड़े, तो उसके खिलाफ
कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यदि कोई व्यक्ति धर्म, संगठन या राजनीतिक समर्थन के नाम पर किसी महिला पर हमला
करता है, तो उसके खिलाफ भी उसी तत्परता से
कार्रवाई होनी चाहिए। कानून के सामने किसी की धार्मिक पहचान, राजनीतिक निकटता या संगठन का नाम ढाल
नहीं बन सकता।
दिल्ली पुलिस को
स्पष्ट करना चाहिए कि उसकी कार्रवाई का आधार कानून है या राजनीतिक दबाव। यदि पुलिस
केवल प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने में सक्रिय दिखे और हमले की शिकायतों पर
अपेक्षित तत्परता न दिखाए, तो उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठेंगे ही।
इन सवालों को उठाने वालों को सरकार-विरोधी बताकर चुप नहीं कराया जा सकता।
धर्म के नाम पर हिंसा की छूट किसने दी?
धर्म आस्था का
विषय है, हिंसा का लाइसेंस नहीं। कोई भी संगठन यदि
धर्म की रक्षा के नाम पर दूसरों को डराने, महिलाओं पर हमला करने या कानून अपने हाथ में लेने का प्रयास
करता है, तो उसे जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। किसी
धार्मिक या सामाजिक संगठन से जुड़ा होने का अर्थ यह नहीं कि उसके सदस्यों को कानून
से ऊपर रहने का अधिकार मिल गया।
सबसे चिंताजनक
स्थिति तब पैदा होती है, जब सड़क पर मौजूद लोगों को लगता है कि वे
अपनी राजनीतिक या धार्मिक पहचान के बल पर किसी को भी निशाना बना सकते हैं। ऐसी
मानसिकता को बढ़ावा देने वाली राजनीति समाज के लिए खतरनाक है। यदि किसी प्रदर्शन
में महिलाओं पर हमला हुआ है, तो उसकी निष्पक्ष
जांच होनी चाहिए, जिम्मेदार लोगों की पहचान की जानी चाहिए
और कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। यह कोई पक्षपातपूर्ण मांग नहीं, बल्कि सामान्य न्याय की मांग है।
भाजपा सरकार को
बताना चाहिए कि महिलाओं की सुरक्षा को लेकर उसके दावे जमीन पर कितने प्रभावी हैं।
महिला सुरक्षा केवल भाषणों, नारों और सरकारी विज्ञापनों का विषय नहीं
हो सकती। असली परीक्षा तब होती है, जब किसी महिला को सड़क पर हिंसा का सामना करना पड़ता है। उस
समय पुलिस की कार्रवाई, प्रशासन की तत्परता और सरकार की जवाबदेही
ही सुरक्षा के दावों की सच्चाई सामने लाती है।
यदि सरकार धर्म के
नाम पर राजनीति करने वाले संगठनों की गतिविधियों पर सवाल उठाने से बचती है, तो इससे समाज में गलत संदेश जाता है।
कानून सभी के लिए है। न भाजपा समर्थक होने से कोई कानून से ऊपर हो जाता है और न
सरकार का विरोध करने से कोई कानून के संरक्षण से वंचित हो सकता है।
भाजपा सरकार को हर विरोध से इतनी परेशानी क्यों?
भाजपा सरकार को यह
तय करना होगा कि वह लोकतंत्र में विश्वास करती है या केवल अपने पक्ष में उठने वाली
आवाजों को सुनना चाहती है। लोकतंत्र का अर्थ सिर्फ चुनाव जीतना नहीं है। लोकतंत्र
का अर्थ है असहमति का सम्मान, नागरिक अधिकारों
की रक्षा और सत्ता को जवाबदेह बनाए रखना।
यदि सरकार को लगता
है कि निर्वाचन आयोग के खिलाफ उठाए गए सवाल गलत हैं, तो वह तथ्यों के साथ जवाब दे। यदि प्रदर्शनकारियों की
मांगें अनुचित हैं, तो उनका सार्वजनिक रूप से खंडन करे। यदि
किसी प्रदर्शन में कानून का उल्लंघन हुआ है, तो निष्पक्ष जांच कराए। लेकिन विरोध को दबाकर, लोगों को हिरासत में लेकर और सवाल पूछने
वालों पर दबाव बनाकर सरकार अपनी छवि मजबूत नहीं कर सकती।
सत्ता की सबसे
बड़ी कमजोरी तब दिखाई देती है, जब वह सवालों का
जवाब देने के बजाय सवाल पूछने वालों को ही समस्या मानने लगती है। जनता को यह जानने
का अधिकार है कि निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवालों का समाधान कैसे
होगा। जनता को यह पूछने का अधिकार है कि प्रदर्शनकारियों को क्यों रोका गया। जनता
को यह भी पूछने का अधिकार है कि महिलाओं पर हमले की शिकायतों पर पुलिस ने क्या
कार्रवाई की।
इन सवालों को
भाजपा-विरोधी राजनीति कहकर खारिज करना आसान है, लेकिन इससे सवाल समाप्त नहीं होते। उलटे, जवाबदेही से बचने की कोशिश संदेह को और
गहरा करती है।
लोकतंत्र भाजपा की जागीर नहीं
दिल्ली देश की
राजधानी है। यहां होने वाली पुलिस कार्रवाई का संदेश पूरे देश में जाता है। यदि
राजधानी में ही नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध करने के अधिकार को लेकर भय महसूस हो, तो देश के दूसरे हिस्सों में लोकतांत्रिक
अधिकारों की स्थिति पर भी सवाल उठेंगे।
सरकार चाहे भाजपा
की हो या किसी अन्य दल की, विरोध का अधिकार जनता का है। आज जो दल
सत्ता में है, वह कल विपक्ष में भी हो सकता है। आज जो
संगठन किसी दूसरे की आवाज दबाने की कोशिश करता है, कल उसकी आवाज भी दबाई जा सकती है। इसलिए लोकतांत्रिक
अधिकारों की रक्षा किसी एक दल या विचारधारा का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे देश के भविष्य का सवाल है।
दिल्ली पुलिस को
याद रखना चाहिए कि उसकी वर्दी जनता की सुरक्षा के लिए है, किसी सरकार की आलोचना से बचाव के लिए
नहीं। उसे प्रदर्शनकारियों के अधिकारों और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन बनाना
होगा। किसी भी हिंसक घटना पर समान रूप से कार्रवाई करनी होगी। भाजपा सरकार को भी
स्पष्ट करना होगा कि वह पुलिस को निष्पक्ष कार्रवाई के लिए स्वतंत्र रखेगी या
विरोध की आवाजों को दबाने की राजनीति जारी रखेगी।
सवाल सीधा है निर्वाचन आयोग से सवाल पूछना अपराध कब से
हो गया? प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेकर किस
लोकतंत्र की रक्षा की जा रही है? महिलाओं पर हमले की शिकायतों पर जवाबदेही कौन तय करेगा? और दिल्ली पुलिस जनता को बताएगी कि उसकी
प्राथमिकता नागरिकों की सुरक्षा है या सत्ता की सुविधा?
इन सवालों का जवाब
बैरिकेडिंग से नहीं मिलेगा। हिरासत से असहमति खत्म नहीं होगी। पुलिस की कार्रवाई
से जनता के सवाल गायब नहीं होंगे। भाजपा सरकार को समझना होगा कि लोकतंत्र में
नागरिक शासक के सामने सिर झुकाने के लिए नहीं, बल्कि सरकार से जवाब मांगने के लिए भी होते हैं। सत्ता
कितनी भी ताकतवर क्यों न हो, संविधान से ऊपर
नहीं हो सकती।
