गिग इकॉनमी: भारत के असंगठित श्रम बाजार को नई दिशा देने की चुनौती.....

डिजिटल प्लेटफॉर्म के विस्तार ने रोजगार की परिभाषा बदली है, लेकिन क्या भारत अपने गिग वर्कर्स को रोजगार के साथ सामाजिक सुरक्षा भी दे पा रहा है?


भारत के श्रम बाजार में एक बड़ा बदलाव धीरे-धीरे आकार ले रहा है। रोजगार अब केवल किसी कार्यालय, कारखाने या संस्थान में निर्धारित समय तक काम करने तक सीमित नहीं रह गया है। स्मार्टफोन, इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने काम को व्यक्ति के हाथ में पहुंचा दिया है। कोई व्यक्ति ऐप के माध्यम से भोजन या सामान पहुंचा रहा है, कोई कैब चला रहा है, कोई ऑनलाइन डिजाइन या कंटेंट तैयार कर रहा है और कोई अलग-अलग कंपनियों के लिए स्वतंत्र रूप से प्रोजेक्ट पूरा कर रहा है।

इसी बदलती कार्य-व्यवस्था को गिग इकॉनमी कहा जाता है।

भारत जैसे विशाल और युवा श्रमबल वाले देश में गिग इकॉनमी केवल तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि रोजगार संरचना में हो रहा एक महत्वपूर्ण परिवर्तन है। यह लाखों लोगों को आय के नए अवसर उपलब्ध करा रही है, लेकिन साथ ही रोजगार की स्थिरता, सामाजिक सुरक्षा, आय की अनिश्चितता और श्रमिक अधिकारों को लेकर गंभीर प्रश्न भी खड़े कर रही है।

तेजी से बढ़ता गिग श्रम बाजार

नीति आयोग की India’s Booming Gig and Platform Economy रिपोर्ट के अनुसार, 2020-21 में भारत में लगभग 77 लाख गिग वर्कर्स थे। रिपोर्ट ने अनुमान लगाया था कि 2029-30 तक यह संख्या बढ़कर लगभग 2.35 करोड़ हो सकती है।

यह वृद्धि केवल आंकड़ों में बदलाव नहीं है। इसका अर्थ है कि आने वाले वर्षों में भारत के रोजगार बाजार का एक बड़ा हिस्सा ऐसे कामगारों का हो सकता है, जिनका काम पारंपरिक स्थायी रोजगार से अलग होगा।

ई-कॉमर्स, ऑनलाइन फूड डिलीवरी, कैब सेवाएं, लॉजिस्टिक्स, डिजिटल फ्रीलांसिंग और अन्य प्लेटफॉर्म आधारित सेवाओं का विस्तार इस परिवर्तन को गति दे रहा है।

खास बात यह है कि गिग इकॉनमी का विस्तार केवल महानगरों तक सीमित नहीं है। छोटे शहरों और कस्बों में भी डिजिटल प्लेटफॉर्म रोजगार और आय के नए अवसर पैदा कर रहे हैं।

असंगठित क्षेत्र का डिजिटल विस्तार?

भारत के रोजगार बाजार की सबसे बड़ी वास्तविकताओं में से एक उसका विशाल असंगठित क्षेत्र है। बड़ी संख्या में श्रमिक ऐसे हैं जिन्हें नियमित वेतन, पेंशन, स्वास्थ्य बीमा, भुगतान वाली छुट्टी या रोजगार की दीर्घकालिक सुरक्षा उपलब्ध नहीं होती।

गिग इकॉनमी इस असंगठित श्रम बाजार को एक नया डिजिटल रूप देती दिखाई देती है।

एक तरफ प्लेटफॉर्म श्रमिकों को काम खोजने में मदद करता है, भुगतान को डिजिटल बनाता है और ग्राहकों तक पहुंच उपलब्ध कराता है। दूसरी तरफ कामगार की आय अक्सर ऑर्डर, ट्रिप, इंसेंटिव, मांग और प्लेटफॉर्म की नीतियों पर निर्भर हो जाती है।

इसलिए गिग इकॉनमी को केवल “लचीले रोजगार” के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। इसके साथ यह सवाल भी जरूरी है कि इस लचीलेपन की कीमत कौन चुका रहा है?

रोजगार का लचीलापन या आय की अनिश्चितता?

गिग इकॉनमी का सबसे बड़ा आकर्षण इसका लचीलापन है। कामगार कई मामलों में अपनी सुविधा के अनुसार काम का समय चुन सकता है। किसी व्यक्ति के लिए यह मुख्य आय का स्रोत हो सकता है, तो किसी दूसरे के लिए अतिरिक्त आय का माध्यम।

लेकिन यही लचीलापन कई बार आर्थिक असुरक्षा में बदल जाता है।

मान लीजिए कोई डिलीवरी वर्कर बीमारी या दुर्घटना के कारण कुछ दिनों तक काम नहीं कर पाता। पारंपरिक नौकरी में जहां कुछ संस्थानों में छुट्टी या बीमा जैसी सुविधाएं उपलब्ध हो सकती हैं, वहीं गिग वर्कर की आय सीधे उसके काम करने की क्षमता से जुड़ी होती है।

इसके अलावा पेट्रोल, वाहन का रखरखाव, मोबाइल इंटरनेट और अन्य परिचालन लागत भी उसकी वास्तविक कमाई को प्रभावित करती हैं।

इसलिए गिग वर्कर की आय को केवल प्लेटफॉर्म से मिलने वाले भुगतान से नहीं समझा जा सकता। वास्तविक आय वह है जो सभी कार्य-संबंधी खर्चों के बाद उसके हाथ में बचती है।

सामाजिक सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती

गिग अर्थव्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण बहस सामाजिक सुरक्षा को लेकर है।

भारत के Code on Social Security, 2020 में गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाएं बनाने का प्रावधान किया गया है। इसमें जीवन और दिव्यांगता कवर, दुर्घटना बीमा, स्वास्थ्य एवं मातृत्व लाभ और वृद्धावस्था सुरक्षा जैसे क्षेत्रों को शामिल किया गया है।

लेकिन नीति और उसके प्रभावी क्रियान्वयन के बीच की दूरी को कम करना सबसे बड़ी चुनौती है।

गिग वर्कर्स की प्रकृति पारंपरिक रोजगार से अलग है। वे एक कंपनी के साथ स्थायी रूप से जुड़े न होकर कई प्लेटफॉर्म या अलग-अलग प्रकार के कार्यों से जुड़े हो सकते हैं। ऐसे में सामाजिक सुरक्षा को किसी एक नियोक्ता से जोड़ने के बजाय कामगार से जोड़ना अधिक प्रभावी मॉडल हो सकता है।

यानी व्यक्ति का प्लेटफॉर्म बदले, काम बदले या शहर बदले उसकी सामाजिक सुरक्षा समाप्त नहीं होनी चाहिए।

प्लेटफॉर्म कंपनियों की जवाबदेही

गिग इकॉनमी में प्लेटफॉर्म कंपनियों की भूमिका केंद्रीय है। वे ग्राहक और कामगार के बीच डिजिटल माध्यम उपलब्ध कराती हैं, काम आवंटित करती हैं और भुगतान प्रणाली को संचालित करती हैं।

इसलिए उनकी जिम्मेदारी केवल तकनीकी प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रह सकती।

भुगतान की गणना कैसे होती है? इंसेंटिव किन शर्तों पर मिलता है? किसी कामगार की रेटिंग कम होने पर क्या प्रभाव पड़ता है? अकाउंट निष्क्रिय करने की प्रक्रिया क्या है? शिकायत की स्थिति में कामगार किससे संपर्क करेगा?

इन सवालों के जवाब स्पष्ट और पारदर्शी होने चाहिए।

विशेष रूप से एल्गोरिदमिक मैनेजमेंट के बढ़ते प्रभाव के दौर में यह महत्वपूर्ण है कि कामगारों को उन डिजिटल निर्णयों की पर्याप्त जानकारी मिले जो उनकी आय और रोजगार को प्रभावित करते हैं।

कौशल विकास बन सकता है परिवर्तन का माध्यम

गिग इकॉनमी को मजबूत करने के लिए केवल अधिक लोगों को प्लेटफॉर्म से जोड़ना पर्याप्त नहीं होगा। जरूरी है कि कामगारों की कमाई की क्षमता और कौशल भी बढ़े।

डिलीवरी और ड्राइविंग जैसे कार्यों के अलावा डिजिटल मार्केटिंग, ग्राफिक डिजाइन, वीडियो एडिटिंग, प्रोग्रामिंग, ऑनलाइन शिक्षा, अकाउंटिंग और अन्य पेशेवर सेवाओं में भी गिग रोजगार की संभावनाएं हैं।

सरकार और निजी क्षेत्र को ऐसे कौशल कार्यक्रम विकसित करने चाहिए जिनका सीधा संबंध बाजार की वास्तविक मांग से हो।

यदि एक कामगार कम-कौशल वाले कार्य से उच्च-कौशल वाले डिजिटल कार्य की ओर बढ़ सके, तो गिग इकॉनमी उसके लिए केवल रोजगार नहीं, बल्कि आर्थिक गतिशीलता का माध्यम बन सकती है।

महिलाओं की भागीदारी पर विशेष ध्यान


गिग इकॉनमी महिलाओं की श्रम भागीदारी बढ़ाने का अवसर भी प्रदान कर सकती है। लचीले कार्य घंटे और डिजिटल प्लेटफॉर्म महिलाओं को पारंपरिक रोजगार के मुकाबले कुछ अतिरिक्त विकल्प देते हैं।

हालांकि इसके लिए सुरक्षित कार्य वातावरण, मातृत्व सहायता, स्वास्थ्य सुरक्षा, शिकायत निवारण और आवश्यक सामाजिक सुविधाओं की उपलब्धता जरूरी है।

महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए केवल रोजगार का अवसर देना पर्याप्त नहीं होगा; उन्हें सुरक्षित और सम्मानजनक कार्य परिस्थितियां भी उपलब्ध करानी होंगी।

सरकार के सामने नीति की बड़ी चुनौती

गिग इकॉनमी को लेकर सरकार के सामने मूल प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि इसे बढ़ावा दिया जाए या रोका जाए। वास्तविक प्रश्न यह है कि तेजी से बढ़ती इस अर्थव्यवस्था को अधिक न्यायपूर्ण और टिकाऊ कैसे बनाया जाए।

इसके लिए सरकार को तीन स्तरों पर समानांतर काम करना होगा


पहला, गिग वर्कर्स की पहचान और पंजीकरण को आसान बनाना।

दूसरा, सामाजिक सुरक्षा को पोर्टेबल और कामगार-केंद्रित बनाना।

तीसरा, प्लेटफॉर्म कंपनियों और कामगारों के बीच अधिक पारदर्शी एवं जवाबदेह व्यवस्था विकसित करना।

इसके साथ ही श्रमिक संगठनों और गिग वर्कर्स की आवाज को नीति निर्माण में पर्याप्त स्थान देना भी आवश्यक होगा।

आगे की राह

भारत के लिए गिग इकॉनमी एक बड़ा अवसर है। यह युवाओं को रोजगार दे सकती है, सेवा क्षेत्र को गति दे सकती है और डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार को मजबूत कर सकती है।

लेकिन यदि गिग इकॉनमी का विस्तार केवल सस्ते और असुरक्षित श्रम पर आधारित रहा, तो यह असंगठित क्षेत्र की पुरानी समस्याओं को खत्म करने के बजाय उनका डिजिटल विस्तार कर सकती है।

इसके विपरीत, यदि गिग वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा, उचित और पारदर्शी भुगतान, कौशल विकास, स्वास्थ्य एवं दुर्घटना सुरक्षा और प्रभावी शिकायत निवारण उपलब्ध कराया जाता है, तो यही व्यवस्था भारत के श्रम बाजार को अधिक आधुनिक और समावेशी बना सकती है।

गिग इकॉनमी भारत के रोजगार भविष्य की एक महत्वपूर्ण वास्तविकता बन चुकी है। इसे नजरअंदाज करना संभव नहीं है। चुनौती यह है कि तकनीक और आर्थिक विकास के साथ श्रमिकों के अधिकार और सामाजिक सुरक्षा भी आगे बढ़ें।

भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होगी कि कितने नए प्लेटफॉर्म बने या कितने ऑर्डर डिलीवर हुए। उसकी असली सफलता इस बात से तय होगी कि उन प्लेटफॉर्मों पर काम करने वाले लोगों का जीवन कितना सुरक्षित, सम्मानजनक और आर्थिक रूप से स्थिर हुआ।

गिग इकॉनमी को यदि केवल “काम पाने का नया तरीका” माना गया, तो इसका लाभ सीमित रहेगा। लेकिन यदि इसे सामाजिक सुरक्षा, कौशल विकास और श्रमिक गरिमा से जोड़कर देखा गया, तो यह भारत के विशाल असंगठित श्रम बाजार को औपचारिक सुरक्षा की दिशा में ले जाने वाला महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है।

यही भारत के सामने असली अवसर भी है और सबसे बड़ी नीति चुनौती भी।

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