तेल से खनिज तक: भारत की ऊर्जा सुरक्षा का अगला मोर्चा

कभी ऊर्जा सुरक्षा का मतलब था तेल, गैस और कोयले की लगातार आपूर्ति। लेकिन दुनिया जैसे-जैसे इलेक्ट्रिक वाहनों, सौर-पवन ऊर्जा, बैटरी स्टोरेज और आधुनिक बिजली ग्रिड की ओर बढ़ रही है, ऊर्जा सुरक्षा का अर्थ भी बदल रहा है।


अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि तेल कहां से आएगा।

सवाल यह भी है कि लिथियम, ग्रेफाइट, निकेल, कोबाल्ट, कॉपर और रेयर अर्थ्स कहां से आएंगे और उन्हें तकनीक में बदलने की क्षमता किसके पास होगी?

यही वजह है कि Critical Minerals यानी महत्वपूर्ण खनिज अब भारत की ऊर्जा और रणनीतिक नीति के केंद्र में हैं।

BRICS में क्यों उठा Critical Minerals का मुद्दा?

सितंबर 2026 में नई दिल्ली में हुए BRICS शिखर सम्मेलन के घोषणा-पत्र में critical minerals की supply chains को reliable, diversified, resilient और sustainable बनाने की जरूरत पर जोर दिया गया। घोषणा-पत्र ने इन्हें zero- और low-emission energy technologies तथा energy security के लिए महत्वपूर्ण बताया।

यह केवल कूटनीतिक भाषा नहीं है। इसके पीछे तेजी से बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था है।

क्यों बढ़ रही है Critical Minerals की मांग?

लिथियम, निकेल, कोबाल्ट और ग्रेफाइट जैसी सामग्रियां batteries में इस्तेमाल होती हैं। कॉपर बिजली के नेटवर्क और electrification के लिए महत्वपूर्ण है, जबकि rare earth elements का इस्तेमाल permanent magnets और कई advanced technologies में होता है।

International Energy Agency के Global Critical Minerals Outlook 2026 के अनुसार मौजूदा नीतियों वाले परिदृश्य में 2040 तक प्रमुख critical minerals की कुल मांग लगभग दोगुनी हो सकती है। लिथियम की मांग तीन गुने से ज्यादा बढ़ने का अनुमान है, जबकि निकेल, ग्रेफाइट और rare earths की मांग में भी 50 से 90 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है। Copper की मांग में 2040 तक लगभग 7 million tonnes की अतिरिक्त वृद्धि का अनुमान है।

यानी clean-energy transition जितनी तेज होगी, minerals की जरूरत भी उतनी बढ़ेगी।

असली चुनौती खनिज नहीं, Supply Chain है

किसी देश के पास mineral reserves होना और उस mineral की पूरी industrial value chain पर पकड़ होना दो अलग बातें हैं।

खनन के बाद processing, refining और फिर battery materials, magnets या दूसरे high-value products का निर्माण होता है।

यहीं वैश्विक असमानता दिखाई देती है।

IEA के अनुसार 2025 में प्रमुख energy minerals की refining में शीर्ष देश की औसत हिस्सेदारी 70 प्रतिशत तक पहुंच गई। चीन अधिकांश प्रमुख energy minerals में सबसे बड़ा refining player है, जबकि nickel में Indonesia की भूमिका बड़ी है।

इसका मतलब है कि भविष्य की supply security केवल mines पर निर्भर नहीं करेगी।

जिसके पास processing और manufacturing की क्षमता होगी, उसके पास supply chain में ज्यादा रणनीतिक ताकत होगी।

भारत के सामने चुनौती

भारत electric mobility, renewable energy, battery storage और advanced manufacturing को तेजी से बढ़ाना चाहता है। लेकिन कई critical minerals और उनसे जुड़ी processing क्षमता के लिए आयात पर निर्भरता बनी हुई है।

इसलिए भारत के सामने दो काम एक साथ हैं

पहला—अपने देश में exploration और mining बढ़ाना।

दूसरा—mining के बाद पूरी value chain विकसित करना।

अगर भारत lithium निकाल भी ले, लेकिन उसे battery-grade material में बदलने की क्षमता बाहर है, तो dependence पूरी तरह खत्म नहीं होगी।

इसलिए लक्ष्य सिर्फ “Mine in India” नहीं होना चाहिए।

लक्ष्य होना चाहिए—

Mine → Process → Refine → Manufacture → Recycle

National Critical Mineral Mission क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत सरकार ने जनवरी 2025 में National Critical Mineral Mission (NCMM) को मंजूरी दी। इसके लिए 2030-31 तक ₹16,300 करोड़ का outlay रखा गया है, जिसमें ₹2,600 करोड़ budgetary support है। मिशन के तहत 1,200 critical-mineral exploration projects का लक्ष्य रखा गया है।

सरकार का प्रयास केवल घरेलू exploration तक सीमित नहीं है। विदेशों में mineral assets हासिल करने, processing capacity बढ़ाने और recycling ecosystem विकसित करने पर भी जोर दिया जा रहा है।

Critical minerals की recycling के लिए ₹1,500 करोड़ की incentive scheme भी शुरू की गई है। सरकार के अनुसार इसके तहत 58 entities ने कुल 8.5 लाख tonnes प्रति वर्ष की प्रस्तावित recycling capacity बताई है।

Recycling: भविष्य की दूसरी खदान

Critical minerals की दौड़ में recycling भारत के लिए बड़ा अवसर बन सकती है।

पुरानी EV batteries, electronic waste और industrial scrap में मौजूद minerals को दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है।

IEA के अनुसार मौजूदा नीतियों के तहत प्रमुख energy minerals में recycling और secondary supply का योगदान 2040 तक आज के लगभग 10 प्रतिशत से बढ़कर करीब 20 प्रतिशत हो सकता है।

यानी भविष्य की mining सिर्फ जमीन के नीचे नहीं होगी।

कुछ हद तक शहरों के भीतर भी होगी।

क्या Energy Transition एक निर्भरता को दूसरी निर्भरता में बदल देगा?

यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।

Fossil-fuel economy में भारत को तेल और गैस की global supply chains पर निर्भर रहना पड़ता है। Electrification इस निर्भरता को कम कर सकती है, लेकिन इसके साथ critical minerals और advanced processing technologies की अहमियत बढ़ रही है।

इसलिए energy transition को केवल “fossil fuels से clean energy की ओर बदलाव” मानना अधूरा होगा।

यह एक बदलाव है:-

Fuel dependency से material dependency की ओर।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि भारत को पूर्ण आत्मनिर्भरता हासिल करनी ही होगी। अधिक व्यावहारिक लक्ष्य supply chains को diversify करना है, ताकि किसी एक देश, supplier या route पर अत्यधिक निर्भरता भारत की energy और industrial security को प्रभावित न कर सके।

असली दौड़ पूरी Value Chain की है

भारत के पास बड़ा बाजार, बढ़ती manufacturing क्षमता और तेजी से विकसित होता technology ecosystem है। लेकिन critical-mineral ecosystem रातोंरात तैयार नहीं होगा।

IEA के अनुसार diversification के लिए सिर्फ नई mines खोलना पर्याप्त नहीं है। Processing technology, specialised equipment, skilled workforce, research और manufacturing capabilities भी विकसित करनी होंगी।

यही भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।

क्योंकि आने वाले समय में सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि किस देश के पास mineral reserves हैं।

किस देश के पास उस mineral को technology, industry और economic power में बदलने की क्षमता है?

दुनिया अगर पेट्रोलियम युग से electrification के युग की ओर बढ़ रही है, तो resources की geopolitics खत्म नहीं होगी।

वह अपना रूप बदलेगी।

कल तेल के कुएं रणनीतिक संपत्ति थे। आज lithium deposits, copper mines, graphite supply chains और rare-earth processing facilities उसी रणनीतिक बहस का हिस्सा बन रहे हैं।

भारत के लिए Critical Minerals इसलिए केवल mining का विषय नहीं हैं।

यह ऊर्जा सुरक्षा, EV, battery manufacturing, advanced technology और strategic autonomy सभी से जुड़ा सवाल है।

आने वाले वर्षों में भारत की असली चुनौती यह नहीं होगी कि उसके पास कितने critical minerals हैं।

चुनौती यह होगी कि भारत उन minerals को अपनी ऊर्जा, अपनी technology और अपनी industrial शक्ति में बदलने वाली पूरी value chain कितनी मजबूती से बना पाता है।

क्योंकि भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा शायद सिर्फ यह तय नहीं करेगी कि आपके पास कितना ईंधन है।

वह यह भी तय करेगी कि भविष्य की ऊर्जा व्यवस्था बनाने के लिए जरूरी खनिज और उन्हें तकनीक में बदलने की क्षमता आपके पास कितनी है।

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