विशेष रिपोर्ट। सच्चिदानंद सच्चू
ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने UN महासभा में अमेरिका के आरोपों का जवाब दिया, युद्ध में मारे गए बच्चों की तस्वीरें दिखाईं और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में दोहरे मानदंड का मुद्दा उठाया
संयुक्त राष्ट्र महासभा का 81वां सत्र ऐसे समय हो रहा है, जब दुनिया कई गंभीर संकटों से जूझ रही है। पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच जारी संघर्ष, गाजा का मानवीय संकट और यूक्रेन युद्ध ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर पहले से ही सवाल खड़े कर रखे हैं। इसी माहौल में बुधवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान का संबोधन खासा चर्चित रहा। उन्होंने अपने भाषण के जरिए न केवल अमेरिका के आरोपों का जवाब दिया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में कथित दोहरे मानदंडों और संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए।
पेजेश्कियान ऐसे समय संयुक्त राष्ट्र पहुंचे, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक दिन पहले इसी मंच से ईरान के खिलाफ कड़ा रुख अपना चुके थे। ट्रंप ने कहा था कि यदि समझौता नहीं हुआ तो अमेरिका ईरान को तबाह करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। इसके कुछ ही घंटों बाद अमेरिकी और ईरानी अधिकारियों के बीच न्यूयॉर्क में अप्रत्यक्ष बातचीत भी हुई। ऐसे में पेजेश्कियान का भाषण महज औपचारिक संबोधन नहीं, बल्कि युद्ध और बातचीत के बीच खड़े ईरान की स्थिति दुनिया के सामने रखने का अवसर भी था।
बच्चों की तस्वीरें दिखाकर दुनिया से पूछा सवाल
पेजेश्कियान अपने साथ उन बच्चों की तस्वीरें लेकर आए थे, जो ईरान में जारी संघर्ष के दौरान मारे गए। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के मंच से तस्वीरें दिखाईं और कहा कि ये निर्दोष बच्चे थे, जिनका युद्ध से कोई लेना-देना नहीं था।
रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने मिनाब में एक बालिका विद्यालय पर हुए हमले में मारे गए बच्चों की तस्वीरें भी प्रदर्शित कीं। ईरानी राष्ट्रपति ने अमेरिका और इजराइल पर ईरान के खिलाफ हमले करने का आरोप लगाते हुए कहा कि ईरानी जनता आतंकवाद की शिकार हुई है।
उनका संदेश यह था कि जिस अमेरिका की ओर से ईरान पर आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया जा रहा है, उसी अमेरिका और उसके सहयोगी इजराइल पर ईरान के नागरिकों को निशाना बनाने के आरोप लगाए जा रहे हैं। पेजेश्कियान ने कहा कि ईरान ने केवल अपना बचाव किया है और वह किसी के सामने घुटने नहीं टेकेगा। हालांकि उनके भाषण में किए गए कुछ दावों को लेकर विवाद भी है।
200 साल में किसी देश पर हमला नहीं करने का दावा
पेजेश्कियान ने अपने पुराने दावे को भी दोहराया कि ईरान ने पिछले 200 वर्षों में किसी देश पर हमला या आक्रमण शुरू नहीं किया। इससे पहले जुलाई 2025 में अमेरिकी पत्रकार टकर कार्लसन से बातचीत में भी उन्होंने यही दावा किया था।
संयुक्त राष्ट्र के मंच से यह बात रखने का मकसद ईरान को आक्रामक शक्ति के बजाय ऐसी ताकत के रूप में पेश करना था, जो अपने ऊपर हुए हमले का जवाब दे रही है। यह तर्क अमेरिका के उस आरोप से अलग है, जिसमें वाशिंगटन ईरान को क्षेत्रीय अस्थिरता और आतंकवाद के प्रमुख स्रोतों में से एक बताता है। ट्रंप ने अपने संयुक्त राष्ट्र भाषण में भी ईरान को आतंकवाद का प्रमुख प्रायोजक बताया था।
असली सवाल युद्ध से आगे बढ़कर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का
पेजेश्कियान के भाषण का महत्वपूर्ण हिस्सा केवल अमेरिका और इजराइल की आलोचना नहीं था। उन्होंने उस अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर सवाल उठाया, जिसमें उनके अनुसार अलग-अलग देशों के लिए अलग-अलग नियम लागू होते हैं।
उनका तर्क था कि यदि अंतरराष्ट्रीय कानून शक्तिशाली देशों के हित के मुताबिक लागू होगा, तो कमजोर देश अपनी सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के बजाय अपनी सैन्य शक्ति पर भरोसा करने लगेंगे।
ईरानी राष्ट्रपति ने परमाणु मुद्दे को भी इसी संदर्भ में उठाया। उन्होंने इजराइल की कथित परमाणु क्षमता और ईरान पर अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण तथा प्रतिबंधों के बीच अंतर को रेखांकित करते हुए इसे दोहरे मानदंड का उदाहरण बताया। उनका तर्क था कि परमाणु हथियारों को लेकर इजराइल पर सवाल कम और ईरान पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी अधिक है।
यहीं से संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता का सवाल सामने आता है। यदि अंतरराष्ट्रीय नियम सभी देशों पर समान रूप से लागू नहीं हो पाते, तो वैश्विक शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई संस्थाओं की विश्वसनीयता कितनी बचती है? ईरान का सवाल इसी बिंदु पर है।
ब्राजील के लूला ने भी उठाई व्यवस्था पर उंगली
संयुक्त राष्ट्र महासभा में ईरान अकेला देश नहीं था, जिसने मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की कमजोरियों पर सवाल उठाए। ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा ने भी अपने संबोधन में बहुपक्षीय व्यवस्था की कमजोरियों का मुद्दा उठाया।
उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र और मौजूदा वैश्विक संस्थाएं युद्ध रोकने तथा कमजोर देशों की रक्षा करने में पर्याप्त प्रभावी नहीं रही हैं। लूला ने बाहरी हस्तक्षेप के खिलाफ ब्राजील की संप्रभुता पर जोर दिया और कहा कि ब्राजील किसी देश का ‘पिछवाड़ा’ नहीं है।
उनके भाषण का व्यापक संदेश यह था कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में सभी देशों की संप्रभुता और समानता का सम्मान होना चाहिए।
यहां ईरान और ब्राजील के दृष्टिकोण में एक समानता दिखाई देती है। दोनों नेता अलग-अलग संदर्भों में यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या वैश्विक संस्थाएं वास्तव में सभी देशों को समान आवाज और समान सुरक्षा दे पा रही हैं।
यूएन की प्रासंगिकता पर बहस क्यों बढ़ी?
संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता पर सवाल केवल ईरान या ब्राजील की ओर से नहीं उठ रहे हैं। इस वर्ष के महासभा सत्र से पहले ही संयुक्त राष्ट्र ने माना है कि बहुपक्षीय व्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है।
महासभा के इस वर्ष के विषय में ही ‘विश्वास बहाल करने’ और ऐसी संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था बनाने की बात कही गई है, जो सभी के लिए काम करे। महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने भी युद्ध, असमानता, जलवायु परिवर्तन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे बड़े संकटों को वैश्विक व्यवस्था के लिए चुनौती बताया है और सुरक्षा परिषद में सुधार की जरूरत पर जोर दिया है।
इसका अर्थ यह नहीं कि संयुक्त राष्ट्र अप्रासंगिक हो चुका है। दुनिया के लगभग सभी देशों को एक मंच पर लाने की उसकी क्षमता अब भी महत्वपूर्ण है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वह मंच केवल भाषणों तक सीमित रहेगा या बड़े देशों को अंतरराष्ट्रीय नियमों के दायरे में लाने की क्षमता भी मजबूत कर पाएगा।
ईरान का भाषण इसी मूल प्रश्न को सामने लाता है। पेजेश्कियान ने एक ओर अमेरिका को चुनौती दी और दूसरी ओर बातचीत का रास्ता भी खुला रखा। उन्होंने कहा कि ईरान संवाद, कूटनीति और बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन दबाव और बल की भाषा स्वीकार नहीं करेगा।
यानी तेहरान का संदेश केवल युद्ध जारी रखने का नहीं था। उसमें शक्ति प्रदर्शन के साथ कूटनीति की पेशकश भी थी। अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधियों के बीच संयुक्त राष्ट्र के इतर हुई बातचीत इस स्थिति को और स्पष्ट करती है।
दरअसल, संयुक्त राष्ट्र महासभा का मौजूदा सत्र एक बड़े वैश्विक सवाल का आईना बन गया है क्या दुनिया नियमों से चलेगी या ताकत के आधार पर? ईरान अमेरिका पर दोहरे मानदंड का आरोप लगा रहा है, ब्राजील शक्तिशाली देशों के हस्तक्षेप के खिलाफ संप्रभुता की बात कर रहा है और संयुक्त राष्ट्र महासचिव खुद बहुपक्षीय व्यवस्था पर बढ़ते दबाव को स्वीकार कर रहे हैं।
ऐसे में संयुक्त राष्ट्र की असली परीक्षा केवल यह नहीं है कि वह कितने नेताओं को एक मंच पर बुला सकता है, बल्कि यह है कि वह उन नेताओं के बीच समान नियम, संवाद और जवाबदेही की कितनी प्रभावी व्यवस्था बना सकता है। यही वह सवाल है, जिसे न्यूयॉर्क में ईरानी राष्ट्रपति के भाषण ने एक बार फिर वैश्विक बहस के केंद्र में ला दिया है।
