समान नागरिक संहिता यानी UCC अब सिर्फ चुनावी घोषणा नहीं, बल्कि 2029 से पहले लागू करने की समयसीमा के साथ सामने है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इसका असर किस पर पड़ेगा और क्या देश के अलग-अलग समुदायों के लिए नागरिक कानून वास्तव में एक जैसे हो पाएंगे?
13 सितंबर 2026 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले NDA शासित 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू कर दी जाएगी। यानी फिलहाल केंद्र की दिशा एक साथ पूरे देश में संसद से एक कानून लाने के बजाय राज्य-दर-राज्य UCC लागू करने की दिखाई दे रही है।
यहीं से UCC की असली कहानी शुरू होती है।
UCC है क्या?
भारत में अपराधों के लिए काफी हद तक समान कानून हैं, लेकिन शादी, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति, गोद लेने और परिवार से जुड़े कुछ मामलों में अलग-अलग धार्मिक समुदायों के व्यक्तिगत कानून लागू होते हैं।
UCC का मूल विचार यह है कि इन नागरिक मामलों में धर्म के आधार पर अलग-अलग नियमों की जगह एक समान कानूनी व्यवस्था हो।
संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य को नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास करने का निर्देश दिया गया है। लेकिन अनुच्छेद 44 नीति-निर्देशक तत्वों में है, इसलिए यह अपने आप UCC लागू नहीं करता।
2029 तक कैसे पहुंचने की तैयारी?
सरकार के सामने दो रास्ते दिखाई देते हैं, एक राष्ट्रीय स्तर पर संसद के जरिए व्यापक कानून और दूसरा राज्यों के जरिए चरणबद्ध कार्यान्वयन।
फिलहाल दूसरा रास्ता ज्यादा स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
उत्तराखंड 27 जनवरी 2025 को स्वतंत्र भारत का पहला राज्य बना जहां UCC लागू हुआ। वहां के आधिकारिक UCC पोर्टल के अनुसार कानून में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेना और उत्तराधिकार-संबंधी मामलों के लिए समान ढांचा बनाया गया है।
इसके बाद दूसरे राज्यों में भी UCC कानून की दिशा में कदम बढ़े हैं। मौजूदा स्थिति में अलग-अलग राज्यों की प्रक्रिया एक जैसी नहीं है कहीं कानून पारित हुआ है, कहीं प्रस्ताव या प्रक्रिया चल रही है। इसलिए “2029 तक पूरे भारत में UCC लागू हो जाएगा” और “2029 तक 21 NDA राज्यों में लागू करने का लक्ष्य है” इन दोनों बातों को एक नहीं समझना चाहिए। शाह का वर्तमान बयान 21 NDA-शासित राज्यों को लेकर है।
उत्तराखंड में UCC को अदालत में चुनौती भी मिल चुकी है। उत्तराखंड हाईकोर्ट में UCC के कई प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिकाएं दाखिल हुई हैं, खासकर लिव-इन रिलेशनशिप के अनिवार्य पंजीकरण को लेकर। हाईकोर्ट ने इन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी भी की कि UCC का मकसद लिव-इन संबंधों से जुड़ी महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को सुरक्षित करना है। इसके अलावा, पंजीकरण प्रक्रिया में आधार से जुड़े दस्तावेज़ और गवाहों की वीडियो रिकॉर्डिंग जैसी सख्त शर्तें भी व्यावहारिक स्तर पर सवालों के घेरे में रही हैं। यानी लागू होने के बाद भी उत्तराखंड मॉडल पूरी तरह "सेटल्ड" नहीं है आगे के राज्यों के लिए यह एक जीवंत, अभी भी अदालत में परखा जा रहा टेम्पलेट है।
फायदा किसे हो सकता है?
UCC के समर्थकों का सबसे बड़ा तर्क समान नागरिक अधिकार है।
अगर एक ही नागरिक मामले में धर्म के आधार पर अलग नियम नहीं होंगे, तो विवाह, तलाक या संपत्ति जैसे मामलों में कानूनी प्रक्रिया अधिक समान हो सकती है।
विशेष रूप से महिलाओं के अधिकार UCC की बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। समर्थकों का तर्क है कि व्यक्तिगत कानूनों में मौजूद असमान प्रावधानों को हटाकर महिलाओं को समान अधिकार दिए जा सकते हैं।
दूसरा संभावित प्रभाव प्रशासनिक हो सकता है। अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के बजाय समान नियम होने से अदालतों, प्रशासन और नागरिकों के लिए प्रक्रिया सरल होने की संभावना बताई जाती है।
लेकिन इसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि अंतिम कानून में विरासत, विवाह, तलाक, भरण-पोषण और गोद लेने के नियम वास्तव में कैसे लिखे जाते हैं।
नुकसान किसे महसूस हो सकता है?
यहीं UCC की सबसे बड़ी सामाजिक बहस शुरू होती है।
भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार हिंदू आबादी करीब 79.8%, मुस्लिम 14.2%, ईसाई 2.3% और सिख 1.7% थे। यानी भारत का नागरिक ढांचा बेहद विविध है।
अलग-अलग समुदायों के धार्मिक और सामाजिक रीति-रिवाजों को एक समान कानूनी ढांचे में लाना आसान नहीं होगा।
आलोचकों की मुख्य चिंता यह है कि समान कानून कहीं बहुसंख्यक समुदाय की सामाजिक परंपराओं को “समान” मानकर बाकी समुदायों पर लागू न कर दे।
दूसरी चिंता आदिवासी समुदायों को लेकर है। अलग-अलग UCC मॉडलों में अनुसूचित जनजातियों के लिए छूट जैसे प्रावधानों पर भी चर्चा हुई है। इसका मतलब है कि “समानता” लागू करने के साथ-साथ भारत की सांस्कृतिक विविधता को कैसे संरक्षित किया जाएगा, यह बड़ा कानूनी सवाल है।
यह छूट सिर्फ चर्चा का विषय नहीं, बल्कि व्यावहारिक तौर पर लागू भी हो चुकी है। उत्तराखंड और असम, दोनों राज्यों के UCC कानूनों में अनुसूचित जनजाति (ST) समुदायों को स्पष्ट रूप से दायरे से बाहर रखा गया है—यह छूट भारतीय संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची, तथा अनुच्छेद 342 के तहत जनजातीय समुदायों को मिले संवैधानिक संरक्षण पर आधारित है। असम में इस छूट पर विधानसभा में तीखी बहस भी हुई, विपक्ष ने इसे "कानून में विरोधाभास" बताया, जबकि मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने तर्क दिया कि जहां जनजातीय रीति-रिवाज पहले से समानता सुनिश्चित करते हैं, वहां अलग से कानून की ज़रूरत नहीं। यानी "समान नागरिक संहिता" अपने ही मॉडल राज्यों में पूरी तरह "समान" नहीं है, और यही विरोधाभास आगे बड़े राज्यों (जैसे मध्य प्रदेश, जहां आदिवासी संगठनों ने पहले ही चिंता जताई है) में और बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।
बिहार में क्यों बढ़ा सवाल?
UCC की राष्ट्रीय बहस का एक महत्वपूर्ण अध्याय बिहार बन सकता है।
अमित शाह के 21 राज्यों वाले बयान के बाद JDU ने कहा है कि बिहार में UCC लागू करने पर पार्टी की स्थिति ड्राफ्ट देखने के बाद तय होगी, जबकि पार्टी के कुछ नेताओं ने राज्य में इसे लागू करने का विरोध भी जताया है।
JDU के भीतर से भी अलग-अलग सुर सुनाई दे रहे हैं। नालंदा से जदयू सांसद कौशलेंद्र कुमार ने सीधे तौर पर कह दिया कि बिहार में एनडीए सरकार होने के बावजूद UCC के मुद्दे पर जदयू भाजपा के साथ नहीं है, और बिहार में यह लागू नहीं होगा। वहीं दूसरी ओर, बिहार के डिप्टी सीएम और वरिष्ठ जदयू नेता विजय कुमार चौधरी ने इसे थोड़ा नरम रुख देते हुए कहा कि अभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी पहले UCC बिल के आधिकारिक प्रावधान सामने आने चाहिए, उनका बारीकी से अध्ययन होगा, पार्टी के भीतर चर्चा होगी, और अगर किसी प्रावधान पर आपत्ति हुई तो सीधे अमित शाह से बात की जाएगी। चौधरी ने यह भी स्पष्ट किया कि JDU का फैसला विपक्षी दल RJD के रुख से प्रभावित नहीं होगा, बल्कि पार्टी अपने स्तर पर बिल का आकलन करेगी।
यानी एक तरफ जदयू का एक सांसद खुले तौर पर UCC का विरोध कर रहा है, तो दूसरी तरफ पार्टी का आधिकारिक नेतृत्व "ड्राफ्ट देखने के बाद फैसला" वाला संतुलित रुख अपनाए हुए है। यह अंतर्विरोध खुद दिखाता है कि NDA के भीतर भी UCC पर पूरी तरह सहमति अभी नहीं बनी है और बिहार जैसे राज्य में, जहां जदयू सरकार का अहम हिस्सा है, अंतिम फैसला सिर्फ केंद्र की मंशा पर नहीं बल्कि गठबंधन के भीतर की सौदेबाज़ी पर भी निर्भर करेगा।
इससे एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है:-
अगर केंद्र का लक्ष्य 21 NDA राज्यों में 2029 से पहले UCC लागू करना है, तो क्या सभी सहयोगी दल और राज्य सरकारें इसके हर प्रावधान पर सहमत होंगी?
यही 2029 की समयसीमा को सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि संघीय ढांचे का भी मुद्दा बनाता है।
असली लड़ाई कानून की नहीं, मॉडल की है
UCC पर बहस अक्सर “पक्ष या विपक्ष” में बदल जाती है। लेकिन असली सवाल शायद इससे ज्यादा जटिल है।
समान नागरिक संहिता में क्या समान होगा?
क्या विवाह की उम्र और पंजीकरण समान होंगे?
क्या तलाक के नियम समान होंगे?
क्या बेटे और बेटी को विरासत में बिल्कुल समान अधिकार मिलेंगे?
क्या सभी धर्मों में गोद लेने की प्रक्रिया समान होगी?
क्या लिव-इन संबंधों के लिए भी समान नियम होंगे?
और सबसे महत्वपूर्ण:- क्या आदिवासी तथा क्षेत्रीय परंपराओं को समान कानून के भीतर विशेष संरक्षण मिलेगा?
उत्तराखंड का मॉडल इन सवालों के लिए पहला बड़ा प्रयोग है, लेकिन पूरे भारत की सामाजिक विविधता उससे कहीं अधिक बड़ी है।
UCC का समर्थक पक्ष इसे समान नागरिक अधिकार और लैंगिक समानता से जोड़ता है। विरोध करने वाले पक्ष को आशंका है कि एकरूपता के नाम पर धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता प्रभावित हो सकती है। दोनों पक्षों की बहस का केंद्र आखिरकार कानून के वास्तविक प्रावधान होंगे, न कि केवल उसका नाम।
इसलिए 2029 तक UCC की कहानी को सिर्फ “कानून आएगा या नहीं” के सवाल से देखना अधूरा होगा।
असल सवाल होगा-
कानून कैसा होगा, किसे क्या अधिकार मिलेगा, किसकी मौजूदा व्यवस्था बदलेगी और भारत की विविधता के साथ समानता का संतुलन कैसे बनाया जाएगा?
2029 की समयसीमा तय कर दी गई है। अब नजर उस ड्राफ्ट पर होगी, जिसमें पहली बार यह साफ होगा कि “समान” भारत के लिए कानून वास्तव में कितना समान होगा।
