इंदौर | 3 अक्टूबर 2026
इंदौर को देश के सबसे स्वच्छ शहरों में गिना जाता है। लेकिन इसी शहर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पेयजल से हुई मौतों ने केवल जलापूर्ति व्यवस्था पर ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक निगरानी, जवाबदेही और बुनियादी शहरी ढांचे पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा गठित एक सदस्यीय न्यायिक आयोग ने अपनी 600 से अधिक पन्नों की रिपोर्ट में कहा है कि भागीरथपुरा की जल प्रदूषण त्रासदी किसी एक अधिकारी की एकल लापरवाही का परिणाम नहीं थी। यह कई वर्षों से चली आ रही संस्थागत विफलताओं, बुनियादी ढांचे की कमियों, प्रशासनिक देरी और निगरानी में चूक का संचयी परिणाम थी। आयोग ने यह भी कहा कि समय रहते जरूरी कदम उठाए जाते तो इस त्रासदी को रोका जा सकता था।
आखिर हुआ क्या था?
दिसंबर 2025 के अंतिम दिनों में इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोगों के बीमार पड़ने की खबर सामने आई। दूषित पेयजल और जलजनित बीमारी की आशंका के बीच कई लोगों को अस्पतालों में भर्ती कराया गया और मौतों का सिलसिला शुरू हुआ।
मौतों की संख्या को लेकर अलग-अलग सरकारी और मीडिया रिपोर्टों में अंतर रहा है। न्यायिक आयोग ने अस्पताल के रिकॉर्ड के आधार पर 22 मौतों को इस जल प्रदूषण की घटना से जोड़ा, जबकि व्यापक घटनाक्रम में 35 मौतों का भी उल्लेख सामने आया है। इस अंतर को समझना जरूरी है, क्योंकि आयोग ने सभी मौतों को समान रूप से दूषित पानी से हुई मौत नहीं माना।
मामले की गंभीरता को देखते हुए मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता में एक सदस्यीय न्यायिक आयोग गठित किया था। आयोग को दूषित पानी के कारण, जिम्मेदारी और प्रशासनिक कार्रवाई से जुड़े सवालों की जांच करनी थी।
पाइपलाइन और सीवरेज व्यवस्था पर गंभीर सवाल
आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक भागीरथपुरा में पेयजल और सीवरेज से जुड़ी पाइपलाइनों की स्थिति लंबे समय से चिंता का विषय थी। पुरानी और क्षतिग्रस्त पाइपलाइनों के कारण सीवेज के पेयजल नेटवर्क में पहुंचने की स्थिति बनी।
रिपोर्ट में पाइपलाइनों की गलत स्थिति, लीकेज और रखरखाव से जुड़ी कमियों को दूषित पानी की घटना के महत्वपूर्ण कारणों में शामिल किया गया है। यानी समस्या केवल उस समय पैदा नहीं हुई जब लोग बीमार पड़े, बल्कि उसके पीछे लंबे समय से बनी हुई बुनियादी ढांचे की कमजोरियां थीं।
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पेयजल की पाइपलाइन और सीवरेज लाइन के बीच पर्याप्त सुरक्षा दूरी और तकनीकी मानकों का पालन किसी भी शहर की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था का मूल हिस्सा है।
72 दिन तक फाइल क्यों अटकी रही?
आयोग की रिपोर्ट में प्रशासनिक प्रक्रिया की एक ऐसी देरी का उल्लेख है जिसने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया।
क्षतिग्रस्त जल पाइपलाइन को बदलने से जुड़ी निविदा प्रक्रिया में 15 अक्टूबर से 26 दिसंबर 2025 के बीच करीब 72 दिनों की देरी हुई। आयोग ने इसे पूरी प्रक्रिया में हुई प्रमुख और असामान्य देरी बताया है।
रिपोर्ट के मुताबिक संबंधित फाइल पर अतिरिक्त आयुक्त की ओर से ‘Discuss’ लिखे जाने के बाद आवश्यक स्पष्टीकरण और आपत्तियों के समाधान की प्रक्रिया तेजी से पूरी होनी चाहिए थी। लेकिन फाइल लगभग 72 दिनों तक लंबित रही।
यही वह बिंदु है जहां एक प्रशासनिक प्रक्रिया और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच संबंध दिखाई देता है। अगर किसी इलाके की जलापूर्ति प्रणाली में गंभीर तकनीकी समस्या मौजूद है, तो उससे जुड़े फैसले में महीनों की देरी केवल कागजी देरी नहीं रह जाती—उसका असर सीधे लोगों के जीवन पर पड़ सकता है।
एक दूसरी परियोजना में 859 दिनों तक की देरी
रिपोर्ट में केवल 72 दिनों की देरी का ही उल्लेख नहीं है। एक अन्य पाइपलाइन परियोजना में निविदा से लेकर काम पूरा होने तक लगभग 859 दिनों की देरी का भी जिक्र किया गया है। आयोग ने पुरानी और क्षतिग्रस्त जल तथा सीवर पाइपलाइनों को बदलने में हुई देरी को पूरे घटनाक्रम के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना।
यह तथ्य इस सवाल को जन्म देता है कि शहरों में बुनियादी ढांचे की मरम्मत और नवीनीकरण को कितनी प्राथमिकता दी जाती है। क्या किसी पाइपलाइन के खराब होने के बाद कार्रवाई केवल शिकायत या संकट सामने आने पर होती है, या उससे पहले नियमित निरीक्षण और जोखिम की पहचान की व्यवस्था भी प्रभावी है?
पानी की जांच ने भी बताई गंभीर स्थिति
जल प्रदूषण के दौरान लिए गए पानी के नमूनों में भी गंभीर बैक्टीरियल संदूषण की पुष्टि हुई। रिपोर्ट के अनुसार मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा लिए गए 52 नमूनों में से 50 में टोटल कोलीफॉर्म और 40 में ई. कोलाई पाया गया। यह पेयजल में मलजनित प्रदूषण की गंभीर स्थिति की ओर संकेत करता है।
यानी सवाल केवल यह नहीं था कि पाइपलाइन पुरानी थी या नहीं। सवाल यह भी था कि दूषित पानी लोगों के घरों तक पहुंचने से पहले निगरानी और चेतावनी की व्यवस्था कितनी प्रभावी थी।
रिकॉर्ड और जवाबदेही पर भी आयोग की नाराजगी
आयोग ने इंदौर नगर निगम और इंदौर विकास प्राधिकरण द्वारा कुछ रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराने को लेकर भी सवाल उठाए। रिपोर्ट में कहा गया कि कुछ पुराने रिकॉर्ड नष्ट किए जाने की बात कही गई, लेकिन इसके समर्थन में नोटशीट, रिकॉर्ड नष्ट करने का रजिस्टर या स्वीकृति संबंधी दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए।
ऐसे मामलों में रिकॉर्ड केवल सरकारी कागज नहीं होते। वे यह पता लगाने का आधार होते हैं कि किसी समस्या की जानकारी कब मिली, किस अधिकारी ने क्या कार्रवाई की और किसी फैसले में कितनी देरी हुई।
आयोग ने किसी एक गलती के बजाय पूरी व्यवस्था पर सवाल उठाया
इस जांच का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि आयोग ने घटना को किसी एक अधिकारी की एकल गलती के रूप में नहीं देखा। रिपोर्ट के अनुसार यह कई दशकों में अलग-अलग स्तरों पर हुई विफलताओं का संचयी परिणाम था।
रिपोर्ट में कुछ अधिकारियों को विभिन्न प्रशासनिक देरी के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार बताया गया है। हालांकि, आयोग ने तत्कालीन इंदौर नगर निगम के दो वरिष्ठ अधिकारियों को समग्र मामले में क्लीन चिट भी दी है। इससे स्पष्ट है कि जिम्मेदारी तय करने का सवाल केवल राजनीतिक या प्रशासनिक आरोपों से नहीं, बल्कि आयोग द्वारा जांचे गए रिकॉर्ड और घटनाक्रम के आधार पर देखा जाना चाहिए।
सवाल इंदौर से आगे का है
भागीरथपुरा की घटना केवल एक शहर या एक मोहल्ले की समस्या के रूप में नहीं देखी जानी चाहिए। सुरक्षित पेयजल किसी भी नागरिक का बुनियादी अधिकार और सार्वजनिक स्वास्थ्य की पहली जरूरत है।
अगर पाइपलाइन में लीकेज है, सीवरेज लाइन पेयजल नेटवर्क के करीब है, पानी की गुणवत्ता की निगरानी कमजोर है और जरूरी मरम्मत की फाइलें महीनों या वर्षों तक अटकी रहती हैं, तो किसी बीमारी के फैलने का इंतजार करना व्यवस्था की सफलता नहीं हो सकती।
इंदौर की यह त्रासदी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि न्यायिक आयोग ने साफ संकेत दिया है कि ऐसी घटनाएं अचानक पैदा नहीं होतीं। उनके पीछे अक्सर छोटी-छोटी प्रशासनिक और तकनीकी चूकें लंबे समय तक जमा होती रहती हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस रिपोर्ट के बाद क्या बदलेगा?
क्या पुरानी जल पाइपलाइनों का समयबद्ध ऑडिट होगा? क्या पेयजल और सीवरेज नेटवर्क की निगरानी मजबूत होगी? क्या शिकायतों और पानी की गुणवत्ता की रिपोर्टिंग को सार्वजनिक किया जाएगा? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या किसी आपात स्थिति से पहले जिम्मेदारी तय करने की व्यवस्था बनाई जाएगी?
भागीरथपुरा में जो हुआ, उसके बाद असली जवाब केवल यह नहीं होना चाहिए कि गलती किसकी थी। असली सवाल यह भी है कि अगली ऐसी त्रासदी को रोकने के लिए व्यवस्था क्या सीखती है।
