योजनाओं की सच्चाई: काग़ज़ों पर विकास, ज़मीन पर संघर्ष

देश में हर साल सैकड़ों सरकारी योजनाओं की घोषणा होती है। बजट भाषणों से लेकर सरकारी विज्ञापनों तक दावा किया जाता है कि ये योजनाएँ गरीब, किसान, मज़दूर, महिला और युवाओं की ज़िंदगी बदल देंगी।

क्या योजनाएँ वास्तव में ज़मीन तक पहुँच पा रही हैं, या सिर्फ़ काग़ज़ों तक सीमित रह गई हैं?

बजट बढ़ता गया, ज़मीनी असर घटता गया

सरकारी आँकड़ों के अनुसार, केंद्र और राज्य सरकारें हर साल लाखों करोड़ रुपये सामाजिक योजनाओं पर खर्च करने का दावा करती हैं।

लेकिन नीति आयोग और CAG (कैग) की कई रिपोर्टें बताती हैं कि:

बड़ी राशि अप्रयुक्त (Unspent) रह जाती है

कई योजनाओं में लाभार्थियों की पहचान गलत होती है

ज़मीनी निगरानी (Monitoring) बेहद कमजोर है

लाभार्थी कौन? हक़दार या पहचान वाले?

ग्रामीण इलाकों में योजनाओं की सच्चाई और भी चौंकाने वाली है।

जिनके पास पहुँच और सिफ़ारिश है, वही योजना का लाभ उठा लेते हैं।

वास्तविक गरीब फॉर्म, दस्तावेज़ और कार्यालयों के चक्कर लगाते रह जाते हैं।

विशेषकर बिहार, यूपी, झारखंड जैसे राज्यों में यह शिकायत आम है कि

“योजना गरीब के नाम पर आती है, लेकिन पहुँचती किसी और के घर।”

डिजिटल सिस्टम: समाधान या नई समस्या?

सरकार ने डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) और ऑनलाइन पोर्टल को पारदर्शिता का हथियार बताया।

लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है:

गाँवों में आज भी इंटरनेट और डिजिटल साक्षरता की कमी है

एक छोटी तकनीकी गलती से पेंशन, राशन या छात्रवृत्ति महीनों अटक जाती है

सुधार के लिए कोई जवाबदेह अधिकारी तय नहीं

योजनाएँ ज़्यादा, जवाबदेही कम।

सबसे बड़ी समस्या है Accountability की कमी।

योजना फेल हो जाए, तो जिम्मेदार कौन?

फंड ग़ायब हो जाए, तो कार्रवाई किस पर?

अक्सर देखा गया है कि जाँच रिपोर्ट बनती है, फाइलें चलती हैं, लेकिन नतीजा शून्य रहता है।

राजनीति बनाम ज़रूरत

कई योजनाएँ ज़रूरत से ज़्यादा राजनीति के लिए लाई जाती हैं।

नाम बदलता है, पोस्टर बदलते हैं, लेकिन:

अस्पताल में दवा नहीं

स्कूल में शिक्षक नहीं

रोज़गार के अवसर नहीं

योजना की सफलता इवेंट और विज्ञापन से नहीं, बल्कि परिणाम से तय होनी चाहिए।

विशेषज्ञों का मानना है कि:

योजनाओं की संख्या नहीं, गुणवत्ता बढ़ाई जाए

स्थानीय स्तर पर सोशल ऑडिट अनिवार्य हो

शिकायत निवारण सिस्टम तेज़ और प्रभावी बने

हर योजना का Public Performance Report जारी हो

सरकारी योजनाएँ अपने आप में गलत नहीं हैं, लेकिन कमज़ोर सिस्टम, भ्रष्टाचार और लापरवाही ने उन्हें बेअसर बना दिया है।

स्थिति और तथ्य

सरकारी सांख्यिकी के अनुसार, भारत में सामाजिक सुरक्षा कवरेज 2015 से 2025 के बीच 19% से बढ़कर 64.3% हो गया है। यानी लगभग 94 करोड़ से अधिक लोग किसी न किसी सामाजिक कल्याण योजना के दायरे में आए हैं।

सरकारी योजनाएँ अपने आप में गलत नहीं हैं। वास्तविक समस्या है जवाबदेही और कार्यान्वयन की कमजोरी। यदि स्थानीय स्तर पर निगरानी, पारदर्शिता और शिकायत निवारण मजबूत किया जाए, तो योजनाएँ सच में गरीब और जरूरतमंद तक पहुँच सकती हैं।

इसलिए, योजनाओं की सफलता केवल काग़ज़ों पर नहीं, बल्कि ज़मीनी हकीकत में नापी जानी चाहिए।

द जज्बा के लिए यह लेख तैयार किया है गणेश ने।

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