आज की महंगाई: विकास के दावे, आम आदमी की हार

भारत में महंगाई अब केवल आर्थिक बहस का विषय नहीं रही। यह एक गहरा सामाजिक संकट बन चुकी है, जिसका सबसे बड़ा बोझ गरीब, मिडिल क्लास और युवा वर्ग उठा रहा है। सवाल यह नहीं है कि महंगाई बढ़ रही है या नहीं, बल्कि यह है कि महंगाई को नियंत्रित करने की ज़िम्मेदारी आखिर निभा कौन रहा है — और इसकी कीमत कौन चुका रहा है?


महंगाई की सबसे पहली मार रसोई पर पड़ती है। दाल, चावल, आटा, सब्ज़ी, तेल, दूध और गैस सिलेंडर जैसी ज़रूरी चीज़ें हर महीने महंगी होती जा रही हैं। गरीब परिवार जहाँ दो वक्त की रोटी के लिए जूझ रहा है, वहीं मिडिल क्लास अपने सम्मानजनक जीवन के लिए लगातार समझौते कर रहा है। सवाल यह है कि जब ज़रूरत की चीज़ें ही आम आदमी की पहुँच से बाहर होने लगें, तो विकास का दावा किसके लिए है?

कमाई और खर्च के बीच की खाई हर दिन चौड़ी हो रही है। निजी क्षेत्र में काम करने वाले लाखों नौकरीपेशा लोग वर्षों से सीमित वेतन पर टिके हुए हैं। सैलरी में मामूली बढ़ोतरी होती है, लेकिन महंगाई कई गुना तेज़ रफ्तार से आगे बढ़ जाती है। नतीजा यह है कि मिडिल क्लास अब बचत नहीं, बल्कि कर्ज़ के सहारे ज़िंदगी चला रहा है। क्या यही उस वर्ग का भविष्य है जिसे देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहा जाता है?

इसका सबसे गहरा असर युवाओं पर पड़ रहा है। पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी पाने की जद्दोजहद, सीमित वेतन और बढ़ता खर्च ये सब मिलकर युवा वर्ग को मानसिक और आर्थिक दबाव में डाल रहे हैं। आज का युवा सिर्फ़ नौकरी नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा की तलाश में है। सवाल यह है कि जब महंगाई युवाओं की मेहनत को ही निगल जाए, तो उनका भरोसा सिस्टम पर कैसे बना रहेगा?

शिक्षा अब अधिकार नहीं, बोझ बनती जा रही है। स्कूल फीस, किताबें, कोचिंग और ऑनलाइन पढ़ाई का खर्च हर साल बढ़ रहा है। माता-पिता अपने सपने छोड़कर बच्चों की पढ़ाई बचाने की कोशिश कर रहे हैं। अगर शिक्षा इतनी महंगी होगी, तो समान अवसर की बात सिर्फ़ भाषणों तक ही सीमित रह जाएगी।

इलाज की स्थिति और भी कठोर है। सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की सीमाओं के कारण लोग निजी अस्पतालों पर निर्भर हैं, जहाँ इलाज आम आदमी की पहुँच से बाहर होता जा रहा है। एक सामान्य बीमारी तक परिवार की वर्षों की बचत खत्म कर देती है। क्या बेहतर इलाज अब सिर्फ़ पैसे वालों का अधिकार बनता जा रहा है?

ग्रामीण और शहरी भारत दोनों ही महंगाई की मार झेल रहे हैं, लेकिन अलग-अलग रूप में। शहरों में किराया, बिजली, पानी और ट्रांसपोर्ट खर्च आम आदमी की कमर तोड़ रहे हैं। वहीं ग्रामीण इलाकों में डीज़ल, खाद, बीज और खेती से जुड़े खर्च बढ़ रहे हैं, लेकिन किसानों की आय उसी अनुपात में नहीं बढ़ रही। सवाल यह है कि नीति बनाते समय ज़मीनी सच्चाई क्यों नज़रअंदाज़ की जाती है?

महंगाई को केवल आंकड़ों और रिपोर्टों से नहीं समझा जा सकता। यह हर उस इंसान की कहानी है जो मेहनत करता है, ईमानदारी से कमाता है और सम्मान के साथ जीना चाहता है। जब तक नीतियों का केंद्र आम आदमी नहीं बनेगा और महंगाई पर ठोस, ज़मीनी नियंत्रण नहीं होगा, तब तक यह सवाल बना रहेगा विकास किसके लिए और कीमत कौन चुका रहा है?

द जज्बा के लिए यह लेख तैयार किया है गणेश ने।

और नया पुराने