भारत का संविधान हर नागरिक को अभिव्यक्ति की आज़ादी देता है। यह वाक्य हम स्कूल में पढ़ते हैं, परीक्षाओं में लिखते हैं और राष्ट्रीय पर्वों पर दोहराते हैं।
लेकिन सवाल यह है क्या यह आज़ादी आज भी उतनी ही जीवित है, या अब यह सिर्फ़ भाषणों और किताबों तक सीमित रह गई है?
आज देश में बोलने की आज़ादी है, मगर एक शर्त के साथ। आप तब तक स्वतंत्र हैं, जब तक आपकी बात सत्ता को असहज न करे। जैसे ही सवाल तीखे होते हैं, वैसे ही शब्द बदल दिए जाते हैं आलोचना को अफ़वाह कहा जाता है, असहमति को साज़िश, और सवाल पूछने वाले को संदिग्ध।
लोकतंत्र में सवाल पूछना नागरिक का अधिकार होता है। लेकिन आज सवाल यह बन गया है सवाल पूछने की कीमत कौन चुकाएगा? छात्र अगर सड़कों पर उतरें तो उनका भविष्य दांव पर लग जाता है। पत्रकार रिपोर्ट करे तो उस पर दबाव बनाया जाता है। आम नागरिक सोशल मीडिया पर कुछ लिख दे तो कानूनी नोटिस का डर सामने आ खड़ा होता है। क्या यही लोकतांत्रिक आत्मविश्वास है?
मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, लेकिन आज वह स्तंभ झुका हुआ दिखाई देता है। सत्ता से सवाल पूछने के बजाय, कई चैनल सवालों को ही देशविरोधी साबित करने में लगे हैं। जो मुद्दे आम जनता की ज़िंदगी से जुड़े हैं महंगाई, बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य वे बहस से गायब होते जा रहे हैं। उनकी जगह शोर है, बहस नहीं।
कानून, जो नागरिकों की सुरक्षा के लिए बनाए गए थे, कई बार डर का माध्यम बनते दिखते हैं। गिरफ़्तारी पहले, सफ़ाई बाद में। सालों तक मुक़दमे चलते हैं और अंत में अदालत कहती है “कोई अपराध नहीं।” तब तक सवाल यह रह जाता है कि नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
सोशल मीडिया को कभी जनता की आवाज़ कहा गया था। आज वही आवाज़ सबसे ज़्यादा निगरानी में है। लोग अब यह नहीं सोचते कि क्या सही है, बल्कि यह सोचते हैं कि क्या सुरक्षित है। जब सच बोलने से पहले डर लगने लगे, तब आज़ादी सिर्फ़ नाम की रह जाती है।
सबसे चिंताजनक बात यह नहीं है कि लोग डर रहे हैं, बल्कि यह है कि लोग इस डर को सामान्य मानने लगे हैं। चुप रहना समझदारी बनता जा रहा है, और सवाल करना दुस्साहस। जब समाज सवाल पूछने वालों को ही समस्या मानने लगे, तब लोकतंत्र धीरे-धीरे खोखला होने लगता है।
आज देश को आत्ममंथन की ज़रूरत है।
क्या हम ऐसा भारत चाहते हैं जहाँ बोलने से पहले सोचना पड़े कि “अंजाम क्या होगा?”
या ऐसा भारत जहाँ सत्ता सवालों से मजबूत हो, न कि असहज?
अभिव्यक्ति की आज़ादी कोई उपहार नहीं, यह लोकतंत्र की बुनियाद है।
और अगर बुनियाद ही डर के सहारे टिकी हो, तो इमारत कितने दिन खड़ी रहेगी?
