सरकारी स्कूल में बच्चे पढ़ रहे हैं या सिर्फ नामांकन बढ़ रहा है? आंकड़े बताते हैं असली चुनौती अब ‘स्कूल पहुंचने’ से ज्यादा ‘सीखने’ की है
सरकारी स्कूलों में नामांकन बढ़ना किसी भी सरकार के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। लेकिन सवाल यह है कि स्कूल पहुंचने के बाद बच्चे वास्तव में कितना सीख रहे हैं? क्या कक्षा में मौजूद हर बच्चा अपनी कक्षा के स्तर की किताब पढ़ सकता है, सामान्य गणित कर सकता है और शिक्षक से पर्याप्त शैक्षणिक मदद पा रहा है?
भारत में शिक्षा की तस्वीर को समझने के लिए सरकारी आंकड़े और जमीन पर किए गए सर्वे दोनों को साथ देखना जरूरी है। UDISE+ सरकारी स्कूलों की संख्या, छात्र-शिक्षक अनुपात और बुनियादी सुविधाओं की तस्वीर दिखाता है, जबकि ASER जैसे घरेलू सर्वे यह बताते हैं कि बच्चे वास्तव में क्या कर पा रहे हैं। दोनों आंकड़ों को साथ रखने पर तस्वीर सिर्फ ‘नामांकन’ की नहीं, बल्कि ‘सीखने की गुणवत्ता’ की बनती है।
नामांकन लगभग सार्वभौमिक, लेकिन सीखने की चुनौती कायम
ASER 2024 के अनुसार, ग्रामीण भारत में 6 से 14 वर्ष के बच्चों का स्कूल में नामांकन 98.1% था। यानी इस उम्र के लगभग सभी बच्चे किसी न किसी स्कूल में जा रहे हैं। यह स्थिति पिछले करीब दो दशकों में 95% से ऊपर बनी हुई है।
लेकिन सरकारी स्कूलों में नामांकन का आंकड़ा अलग कहानी बताता है। 2018 में 6-14 वर्ष के 65.6% बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे। कोविड के बाद 2022 में यह हिस्सा बढ़कर 72.9% हुआ, लेकिन 2024 में घटकर 66.8% रह गया। यानी केवल नामांकन बढ़ने को सरकारी स्कूलों की मजबूती का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।
यहीं से सबसे बड़ा सवाल सामने आता है बच्चा स्कूल में है, लेकिन क्या वह सीख भी रहा है?
बिहार की तस्वीर: सुधार हुआ है, लेकिन अंतर अभी भी बड़ा है
बिहार के ग्रामीण इलाकों के लिए ASER 2024 के आंकड़े कुछ सकारात्मक बदलाव दिखाते हैं। कक्षा 2 के सरकारी स्कूलों के बच्चों में कम-से-कम शब्द पढ़ पाने की क्षमता 2022 के 23.5% से बढ़कर 2024 में 30.6% हुई। यानी दो वर्षों में सुधार जरूर हुआ है।
लेकिन इसका दूसरा पहलू ज्यादा गंभीर है।
2024 में बिहार के सरकारी स्कूलों के कक्षा 2 के केवल 30.6% बच्चे कम-से-कम शब्द पढ़ पा रहे थे, जबकि निजी स्कूलों में यह आंकड़ा 74.1% था। इसी तरह 99 तक की संख्या पहचानने वाले सरकारी स्कूलों के बच्चों का अनुपात 40.1%, जबकि निजी स्कूलों में 83.7% था।
इसका अर्थ यह नहीं है कि सरकारी स्कूलों में बच्चे बिल्कुल नहीं सीख रहे हैं। बल्कि आंकड़े बताते हैं कि सीखने की गति और स्तर में सरकारी और निजी स्कूलों के बीच अभी भी बड़ा अंतर मौजूद है।
बिहार में स्कूल तो हैं, लेकिन क्या हर स्कूल पर्याप्त संसाधनों से लैस है?
UDISE+ 2024-25 के अनुसार बिहार में 94,339 स्कूलों में 2.11 करोड़ से अधिक विद्यार्थी और लगभग 7.07 लाख शिक्षक हैं। राज्य का विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात 2023-24 के 32 से सुधरकर 2024-25 में 30 हुआ है, हालांकि राष्ट्रीय अनुपात 24 है।
यह सुधार शिक्षकों की संख्या बढ़ने की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत है। लेकिन स्कूलों के बीच संसाधनों का वितरण और बुनियादी सुविधाएं अभी भी बड़ा सवाल हैं।
रिपोर्ट के अनुसार बिहार में 1,865 स्कूल ऐसे थे जहां केवल एक शिक्षक था और इन स्कूलों में 1.75 लाख से अधिक विद्यार्थी पढ़ रहे थे। दूसरी ओर, कम से कम पांच स्कूलों में शून्य नामांकन दर्ज हुआ, जबकि वहां 17 शिक्षक पदस्थापित थे।
यह तस्वीर बताती है कि समस्या सिर्फ ‘कितने शिक्षक हैं’ की नहीं है, बल्कि ‘कहां कितने शिक्षक हैं और बच्चों तक उनकी पहुंच कितनी है’ की भी है।
किताब, शिक्षक और स्कूल भवन से आगे बढ़कर ‘सीखने’ को मापना होगा
बिहार के सरकारी स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं में भी कई कमियां दर्ज हुई हैं। UDISE+ 2024-25 के अनुसार 2,760 स्कूलों में बिजली कनेक्शन नहीं था और 1,045 स्कूलों में पेयजल सुविधा नहीं थी। करीब 31,434 स्कूलों में पुस्तकालय और 46,187 स्कूलों में खेल का मैदान नहीं था। वहीं 70,589 स्कूलों में कंप्यूटर सुविधा नहीं थी।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि 21वीं सदी की शिक्षा केवल बच्चों को स्कूल तक पहुंचाने और उनका नामांकन दर्ज करने से पूरी होगी या उन्हें पढ़ने, समझने, गणना करने और डिजिटल दुनिया के लिए तैयार करने से?
ग्राउंड रिपोर्ट का मतलब सिर्फ स्कूल की तस्वीर नहीं
शिक्षा की वास्तविक स्थिति समझने के लिए सरकारी आंकड़ों के साथ घर-घर जाकर बच्चों का आकलन करने वाले सर्वे बेहद महत्वपूर्ण हैं। ASER 2024 ने देश के 605 ग्रामीण जिलों के 17,997 गांवों में 6.49 लाख से अधिक बच्चों का सर्वे किया। इसमें बच्चों से सीधे पढ़ने और गणित के कार्य करवाकर उनकी क्षमता का आकलन किया गया।
यानी किसी स्कूल में 100% नामांकन होना और वहां के बच्चों का सीखने का स्तर अच्छा होना दो अलग-अलग बातें हैं।
अगर कक्षा 5 का बच्चा कक्षा 2 के स्तर का पाठ नहीं पढ़ पा रहा है, तो केवल उसकी उपस्थिति और नामांकन का आंकड़ा शिक्षा की सफलता नहीं बता सकता।
तो क्या सरकारी स्कूलों में बच्चे सिर्फ नामांकित हैं?
जवाब सीधा ‘हां’ या ‘नहीं’ नहीं है।
आंकड़े यह बताते हैं कि सरकारी स्कूलों में बच्चे पढ़ रहे हैं और सीखने के स्तर में सुधार भी हो रहा है। बिहार में कक्षा 2 के सरकारी स्कूलों के बच्चों की शब्द पढ़ने की क्षमता 23.5% से बढ़कर 30.6% होना इसका उदाहरण है।
लेकिन दूसरी तरफ 70% के करीब बच्चे अभी भी उस स्तर तक नहीं पहुंच पाए थे, और निजी स्कूलों के मुकाबले अंतर काफी बड़ा था।
इसलिए अब शिक्षा नीति का अगला लक्ष्य केवल ‘हर बच्चा स्कूल में’ नहीं बल्कि ‘हर बच्चा सीख रहा है’ होना चाहिए।
नामांकन शिक्षा की पहली सीढ़ी है, मंजिल नहीं।
सरकारें स्कूलों की संख्या, भवन, शिक्षक नियुक्ति और नामांकन के आंकड़े गिना सकती हैं, लेकिन शिक्षा की असली परीक्षा उस बच्चे के हाथ में है जो स्कूल से निकलकर किताब पढ़ता है, गणित का सवाल हल करता है और अपने आसपास की दुनिया को समझ पाता है।
अगर बच्चा स्कूल में आठ साल बिताने के बाद भी बुनियादी पढ़ाई और गणित में पीछे रह जाता है, तो हमें यह पूछना ही होगा स्कूल में उसकी उपस्थिति बढ़ी है या उसकी शिक्षा की गुणवत्ता?
और शायद यही वह सवाल है जिसे सरकारी स्कूलों की अगली बड़ी बहस का केंद्र बनना चाहिए।
स्रोत: UDISE+ 2024-25, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार; ASER 2024, Pratham/ASER Centre; बिहार संबंधी UDISE+ आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट।
