रजत बनर्जी। कोलकाता
पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) को लेकर चल रहा आंतरिक विवाद अब चुनाव चिह्न और पार्टी के नाम तक पहुंच गया है। चुनाव आयोग ने अंतरिम आदेश में All India Trinamool Congress (AITC) नाम और उसके पारंपरिक ‘फूल और घास’ चुनाव चिह्न को दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों के लिए फ्रीज़ कर दिया है। यह फैसला आगामी उपचुनावों को देखते हुए लिया गया है।
आखिर चुनाव चिह्न क्यों हटाया गया?
मामले की शुरुआत TMC के भीतर संगठनात्मक नियंत्रण को लेकर विवाद से हुई। एक तरफ ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट है, जबकि दूसरी तरफ रितब्रत बनर्जी और अरूप रॉय से जुड़ा विद्रोही गुट पार्टी पर अपना दावा कर रहा है।
दोनों पक्षों ने चुनाव आयोग के सामने पार्टी के संगठन और नेतृत्व को लेकर अपने-अपने दावे पेश किए। विवाद इतना बढ़ गया कि दोनों पक्षों की ओर से उपचुनाव के लिए TMC के नाम पर अलग-अलग Form-B भी जमा किए गए।
चुनाव आयोग ने कहा कि उसके सामने फिलहाल दो प्रतिद्वंद्वी समूह हैं और दोनों खुद को असली TMC बता रहे हैं। चूंकि संगठनात्मक विवाद पर अंतिम फैसला तुरंत करना संभव नहीं था और उपचुनाव नजदीक थे, इसलिए आयोग ने अंतरिम व्यवस्था के तौर पर मूल नाम और चुनाव चिह्न को फ्रीज़ कर दिया।
किन चुनावों पर पड़ेगा असर?
यह फैसला फिलहाल आगामी 6 अक्टूबर के उपचुनावों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। इनमें पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटें शामिल हैं। इसके अलावा असम की नगांव लोकसभा सीट के उपचुनाव का भी उल्लेख चुनाव आयोग के आदेश से संबंधित रिपोर्टों में है।
इसका मतलब यह नहीं है कि TMC हमेशा के लिए अपना चुनाव चिह्न खो चुकी है। आयोग ने इसे अंतरिम व्यवस्था के तौर पर लागू किया है। पार्टी के नाम और मूल चिह्न पर अंतिम फैसला बाद में होगा।
अब दोनों गुटों को क्या मिला?
18 सितंबर को चुनाव आयोग ने दोनों गुटों के लिए अस्थायी नाम और चुनाव चिह्न आवंटित कर दिए।
ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को नाम दिया गया है: “Mamata All India Trinamool Congress” और चुनाव चिह्न के तौर पर ‘Football Player’ आवंटित किया गया है।
वहीं अरूप रॉय के नेतृत्व वाले गुट को: “Democratic Trinamool Congress”
नाम और ‘Envelope’ (लिफाफा) चुनाव चिह्न दिया गया है।
ये नाम और चिह्न फिलहाल संबंधित उपचुनावों के लिए हैं। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि आयोग ने स्थायी रूप से किसी एक गुट को मूल TMC मान लिया है।
असली विवाद क्या है?
विवाद सिर्फ चुनाव चिह्न का नहीं है। दोनों पक्ष यह दावा कर रहे हैं कि पार्टी का वास्तविक संगठनात्मक नियंत्रण उनके पास है।
रितब्रत बनर्जी के पक्ष की ओर से यह तर्क दिया गया है कि ममता बनर्जी की राष्ट्रीय कार्यसमिति का कार्यकाल 11 फरवरी 2025 को समाप्त हो गया था और उसके बाद लिए गए कुछ संगठनात्मक फैसले वैध नहीं थे।
ममता बनर्जी के गुट ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा है कि विरोधी पक्ष पुराने पार्टी संविधान के प्रावधानों पर निर्भर कर रहा है और बाद में किए गए संशोधनों को नजरअंदाज कर रहा है।
अब आगे क्या होगा?
चुनाव आयोग के सामने अब मुख्य सवाल यह है कि किस गुट को मूल All India Trinamool Congress और ‘फूल एवं घास’ वाला चुनाव चिह्न दिया जाए या क्या किसी अन्य व्यवस्था की जरूरत होगी।
ऐसे मामलों में चुनाव आयोग Election Symbols (Reservation & Allotment) Order, 1968 के Paragraph 15 के तहत दोनों पक्षों के दावों, संगठनात्मक समर्थन और निर्वाचित प्रतिनिधियों समेत उपलब्ध तथ्यों पर विचार कर सकता है।
इससे पहले भी भारत में पार्टी विभाजन के मामलों में चुनाव आयोग ने चुनाव चिह्न को अस्थायी रूप से फ्रीज़ किया है। उदाहरण के तौर पर शिवसेना के विभाजन के दौरान ऐसा हुआ था। बाद में आयोग ने संबंधित गुट के पक्ष में अंतिम फैसला किया था।
